हल्द्वानी। उत्तराखंड की राजनीति में 4 जून का दिन कांग्रेस के लिए एक बड़े राजनीतिक अवसर के रूप में देखा जा रहा था। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का अल्मोड़ा, पौड़ी और देहरादून का दौरा प्रस्तावित था। पार्टी कार्यकर्ताओं ने लंबे समय से इसकी तैयारी की थी और बड़ी संख्या में लोग उनके इंतजार में जुटे थे। लेकिन खराब मौसम के कारण हेलीकॉप्टर उड़ान प्रभावित हुई और अंततः पूरा दौरा रद्द कर राहुल गांधी दिल्ली लौट गए।
सवाल मौसम पर नहीं, राजनीतिक संदेश पर है।
पहाड़ का मौसम कब बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। सुरक्षा और उड़ान संबंधी निर्णय विशेषज्ञों के हाथ में होते हैं। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो चर्चा इस बात की अधिक हो रही है कि क्या राहुल गांधी किसी वैकल्पिक कार्यक्रम के जरिए जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते थे?
अल्मोड़ा की जनसभा नहीं हो सकी, यह मौसम की मजबूरी हो सकती है। लेकिन क्या देहरादून या गढ़वाल मंडल के अन्य कार्यक्रमों में सड़क मार्ग या अन्य विकल्पों के जरिए पहुंचने की संभावना थी? यही वह प्रश्न है जो अब राजनीतिक गलियारों में उठ रहा है।
उत्तराखंड में कांग्रेस पिछले कई वर्षों से सत्ता से बाहर है। भाजपा लगातार संगठनात्मक और चुनावी बढ़त बनाए हुए है। ऐसे समय में राहुल गांधी का दौरा केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने और आगामी चुनावी रणनीति का संदेश देने का अवसर था।
राजनीति में अक्सर नेता का भाषण नहीं, बल्कि उसकी मौजूदगी ज्यादा मायने रखती है। जब कार्यकर्ता घंटों इंतजार कर रहे हों, तब केवल फोन पर संबोधन और फिर दिल्ली वापसी कई लोगों को अधूरा संदेश लग सकती है। विशेषकर तब, जब कांग्रेस राज्य में अपने संगठन को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही हो।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पहाड़ के राज्यों में जनता नेताओं से सीधा संवाद चाहती है। मौसम की चुनौती को स्वीकार करते हुए भी यदि कोई नेता किसी एक कार्यक्रम में पहुंच जाता है, तो उसका प्रतीकात्मक प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि राहुल गांधी के इस दौरे को लेकर अब चर्चा कार्यक्रमों से ज्यादा उनके रद्द होने पर हो रही है।
आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की दृष्टि से देखें तो उत्तराखंड कांग्रेस के लिए आसान राज्य नहीं है। भाजपा यहां मजबूत संगठन, सरकार और संसाधनों के साथ मैदान में है। ऐसे में कांग्रेस को हर राजनीतिक अवसर का अधिकतम उपयोग करना होगा। राहुल गांधी का यह दौरा कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर सकता था, लेकिन मौसम ने उस संभावना को अधूरा छोड़ दिया।
हालांकि यह भी सच है कि सुरक्षा और मौसम से जुड़े निर्णय राजनीतिक इच्छाशक्ति से नहीं, बल्कि विशेषज्ञों की सलाह से तय होते हैं। फिर भी राजनीति में धारणा का महत्व बहुत बड़ा होता है। जनता और कार्यकर्ताओं के मन में अब यही सवाल है कि क्या इस दौरे को किसी वैकल्पिक रूप में बचाया जा सकता था?

