28 साल बाद लौटी कत्यूरी बैसी: आखिर क्यों मनाया जाता है यह दुर्लभ लोकपर्व, क्यों थम गई थी परंपरा और क्या है इसका धार्मिक महत्व?

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द्वाराहाट/अल्मोड़ा। उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और कत्यूरी राजवंश की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी कत्यूरी बैसी की परंपरा 28 वर्षों बाद एक बार फिर जीवंत हो उठी है। इस आयोजन ने पहाड़ से लेकर भाबर तक आस्था, लोक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को एक सूत्र में बांध दिया है। सात गांवों के श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा, ढोल-दमाऊ, हुड़का और लोकदेवताओं की पूजा-अर्चना के साथ इस अनूठे धार्मिक अनुष्ठान में शामिल हो रहे हैं।

क्या है कत्यूरी बैसी?

‘बैसी’ उत्तराखंड की एक प्राचीन धार्मिक तपस्या परंपरा है। इसमें साधक लगातार 11 दिनों तक कठोर नियमों का पालन करते हैं। इस दौरान सात्विक जीवन, संयम, पूजा-अर्चना, लोकदेवताओं की आराधना और सामूहिक धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और पूर्वजों की परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम भी माना जाता है।

मान्यता है कि यह अनुष्ठान क्षेत्र में सुख-समृद्धि, अच्छी वर्षा, खेती की उन्नति, प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा और समाज की खुशहाली की कामना के लिए किया जाता है। इस दौरान भगवान शिव, भूमि देवता, ग्राम देवता और कत्यूरी राजवंश से जुड़ी वीरांगना महारानी जिया की विशेष पूजा की जाती है।

28 साल तक क्यों बंद रही परंपरा?

स्थानीय जानकारों के अनुसार, समय के साथ सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव, परंपरा निभाने वाले लोगों की कमी, आर्थिक चुनौतियां और आयोजन की जटिल व्यवस्थाओं के कारण यह परंपरा वर्षों तक आयोजित नहीं हो सकी। अब स्थानीय ग्रामीणों, युवाओं और सामाजिक संगठनों के प्रयास से इसे दोबारा शुरू किया गया है, ताकि नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके।

इस बार बैसी में केवल बुजुर्ग साधक ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में युवा भी संन्यास जैसे अनुशासन का पालन करते हुए अनुष्ठान में शामिल हुए। इससे यह संदेश गया कि आधुनिक दौर में भी उत्तराखंड की लोक परंपराएं नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।

लोक संस्कृति का जीवंत उत्सव

बैसी के दौरान ढोल-दमाऊ, हुड़का, लोकगीत, जागर, देव अवतरण और सामूहिक पूजा जैसे आयोजन उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक पेश करते हैं। श्रद्धालु पवित्र नदी में स्नान कर देवी-देवताओं का आशीर्वाद लेते हैं और पूरे क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण बन जाता है।

कत्यूरी बैसी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान, इतिहास और लोकसंस्कृति का जीवंत प्रतीक है। 28 साल बाद इसकी वापसी इस बात का संकेत है कि प्रदेश की पुरानी परंपराओं को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिशें फिर से मजबूत हो रही हैं। यही प्रयास उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को आने वाले वर्षों तक जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।