नाबालिग भांजी से दुष्कर्म के दोषी मामा को 20 साल का कठोर कारावास, अदालत ने सुनाया सख्त फैसला

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बागेश्वर। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में नाबालिग भांजी से दुष्कर्म के मामले में विशेष पोक्सो अदालत ने आरोपी सगे मामा को दोषी ठहराते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने आरोपी पर दो लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जुर्माना जमा नहीं करने पर उसे छह माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा।

मामले की सुनवाई के दौरान वैज्ञानिक साक्ष्यों ने अहम भूमिका निभाई। पुलिस जांच में पीड़िता, आरोपी और भ्रूण के डीएनए नमूनों की फोरेंसिक जांच कराई गई। रिपोर्ट में आरोपी को भ्रूण का जैविक पिता पाया गया, जिससे अभियोजन पक्ष के आरोपों की पुष्टि हुई और अदालत ने इसे महत्वपूर्ण साक्ष्य माना।

अभियोजन के अनुसार, पीड़िता बचपन से अपने नाना-नानी के घर रह रही थी। वर्ष 2024 में पेट दर्द की शिकायत पर अस्पताल में जांच के दौरान उसके गर्भवती होने की जानकारी मिली। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और पोक्सो अधिनियम तथा दुष्कर्म की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया।

सुनवाई के दौरान सामने आया कि शुरुआत में पीड़िता ने कुछ अन्य लोगों के नाम लिए थे। बाद में बाल कल्याण समिति की काउंसलिंग और न्यायालय में दर्ज बयान में उसने स्पष्ट किया कि उसके सगे मामा ने ही उसके साथ दुष्कर्म किया था। पीड़िता ने यह भी बताया कि आरोपी ने उसे दूसरे लोगों के नाम लेने के लिए दबाव बनाया था।

अदालत ने जुर्माने की राशि में से 1.75 लाख रुपये पीड़िता को मुआवजे के रूप में देने के आदेश दिए हैं। इसके अलावा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को राज्य की पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत पीड़िता को पांच लाख रुपये की अतिरिक्त आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया।

अदालत की सख्त टिप्पणी

निर्णय में अदालत ने कहा कि आरोपी ने पारिवारिक रिश्ते और विश्वास का घोर दुरुपयोग किया है। ऐसे अपराध केवल पीड़िता के जीवन पर गहरा मानसिक और सामाजिक प्रभाव नहीं डालते, बल्कि समाज में बेटियों की सुरक्षा और पारिवारिक विश्वास को भी गंभीर आघात पहुंचाते हैं। अदालत ने माना कि आरोपी का पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं था, लेकिन अपराध की गंभीरता को देखते हुए कठोर दंड देना आवश्यक था।

विद्यालयी अभिलेखों और हाईस्कूल प्रमाणपत्र के आधार पर अदालत ने माना कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 वर्ष 9 माह थी। इसलिए कानून के अनुसार उसकी किसी भी कथित सहमति का कोई महत्व नहीं माना गया। अदालत ने दोषी को तत्काल कारागार भेजने और विचाराधीन अवधि को सजा में समायोजित करने का भी आदेश दिया।