चमोली। विश्व प्रसिद्ध चारधाम में शुमार बदरीनाथ धाम के कपाट गुरुवार सुबह वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। भगवान बदरी विशाल के कपाट ठीक सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर खोले गए, जिसके साथ ही पूरे मंदिर परिसर में ‘जय बदरी विशाल’ के जयकारों की गूंज सुनाई दी।
इस खास मौके पर मंदिर को करीब 20 क्विंटल फूलों से भव्य रूप से सजाया गया, जिससे धाम की दिव्यता और आभा देखते ही बन रही थी। हजारों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने और कपाट खुलते ही दर्शन के लिए लंबी कतारें लग गईं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी इस अवसर पर धाम में मौजूद रहे।
चारधाम यात्रा 2026 पूरी तरह शुरू
चारधाम यात्रा 2026 का अब पूर्ण रूप से शुभारंभ हो चुका है। इससे पहले 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया के दिन यमुनोत्री धाम और गंगोत्री धाम के कपाट खोले गए थे, जबकि 22 अप्रैल को केदारनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।
अब बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के साथ ही आस्था, भक्ति और श्रद्धा से जुड़ी चारधाम यात्रा ने पूरी रफ्तार पकड़ ली है। प्रशासन और बदरी-केदारनाथ मंदिर समिति ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं।
सुरक्षा और व्यवस्थाएं चाक-चौबंद
चमोली के एसपी सुरजीत सिंह पंवार ने यात्रा ड्यूटी में तैनात पुलिस बल को भीड़ नियंत्रण के साथ ‘अतिथि देवो भवः’ की भावना से कार्य करने के निर्देश दिए हैं। उत्तराखंड पुलिस की थीम ‘मित्रता, सेवा, सुरक्षा’ के अनुरूप श्रद्धालुओं को बेहतर अनुभव देने पर जोर दिया गया है।
क्यों कहा जाता है ‘भू बैकुंठ’?
भगवान विष्णु को समर्पित बदरीनाथ धाम अलकनंदा नदी के तट पर समुद्र तल से करीब 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसे ‘भू बैकुंठ’ यानी धरती का वैकुंठ कहा जाता है।
मंदिर परिसर में कुल 15 मूर्तियां हैं, जिनमें मुख्य रूप से एक मीटर ऊंची शालिग्राम पत्थर की भगवान विष्णु की प्रतिमा ध्यानमग्न मुद्रा में विराजमान है। उनके साथ कुबेर, लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां भी स्थापित हैं।
पंच बदरी की विशेष मान्यता
बदरीनाथ धाम में भगवान विष्णु के पांच स्वरूपों की पूजा होती है, जिन्हें ‘पंच बदरी’ कहा जाता है। इनमें
- योगध्यान बदरी
- भविष्य बदरी
- वृद्ध बदरी
- आदिबदरी
शामिल हैं। इनमें बदरीनाथ धाम को मुख्य और सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।
दक्षिण भारत से आते हैं मुख्य पुजारी
मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर को चारधाम में स्थापित किया था। मंदिर की परंपरा के अनुसार यहां के मुख्य पुजारी (रावल) दक्षिण भारत के केरल राज्य से आते हैं। मंदिर तीन भागों गर्भगृह, दर्शन मंडप और सभा मंडप में विभाजित है।
चारधाम यात्रा के शुभारंभ के साथ ही उत्तराखंड एक बार फिर आस्था और अध्यात्म का केंद्र बन गया है, जहां देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।

