हल्द्वानी। उत्तराखंड में गुटखा और तंबाकू-निकोटीन युक्त पान मसाले पर एक साल का प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी हो गया है। लेकिन इस फैसले की सबसे बड़ी परीक्षा सिर्फ दुकानों से प्रतिबंधित उत्पाद हटाने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि राज्य में इनकी खपत कितनी है और प्रतिबंध के बाद उसमें कितनी कमी आती है।
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस की 13 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र सरकार संसद में बता चुकी है कि 33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ऐसे उत्पादों पर रोक लगाने के लिए आदेश जारी किए जा चुके हैं। इसके बावजूद अलग-अलग पैकेटों में सामग्री बेचकर प्रतिबंध से बचने की कोशिश रोकना प्रवर्तन एजेंसियों के सामने चुनौती रहा है।
ग्रामीण खपत का संकेत, आंकड़े समझना जरूरी
आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के फरवरी 2026 के वर्किंग पेपर में 2023-24 के ग्रामीण उपभोग संबंधी आंकड़ों के आधार पर उत्तराखंड में गुटखे की खपत का इंसिडेंस 35.3 प्रतिशत बताया गया है। यह अध्ययन आधारित संकेतक है; इसे बिना इसकी गणना-पद्धति समझे राज्य की 35.3 प्रतिशत आबादी के गुटखा सेवन करने का आंकड़ा नहीं कहा जा सकता।
दूसरी ओर, ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (GATS-2), 2016-17 के अनुसार उत्तराखंड में 12.4 प्रतिशत वयस्क धूम्ररहित तंबाकू का सेवन करते थे। यह गुटखा-विशेष का आंकड़ा नहीं है और दोनों आंकड़ों की अवधि तथा मापन-पद्धति अलग है।
इन आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण जरूरत सामने आती है कि राज्य में तंबाकू और गुटखे की खपत का नियमित, स्पष्ट और तुलनीय आकलन हो, ताकि प्रतिबंध के असर को केवल निरीक्षण या जब्ती की संख्या से नहीं, बल्कि खपत में वास्तविक बदलाव से भी मापा जा सके।
एक साल ही क्यों, स्थायी रोक क्यों नहीं?
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 30(2)(क) के तहत राज्य के खाद्य सुरक्षा आयुक्त को जनस्वास्थ्य के हित में किसी खाद्य पदार्थ के निर्माण, भंडारण, वितरण या बिक्री पर अधिकतम एक साल तक रोक लगाने का अधिकार है। उत्तराखंड में 13 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश इसी प्रावधान पर आधारित है।



