चंपावत। गुरुद्वारा श्री रीठा साहिब में 29 मई से तीन दिवसीय जोड़ मेले का शुभारंभ होने जा रहा है। देवभूमि उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में स्थित यह पवित्र स्थल एक बार फिर श्रद्धा, सेवा और आस्था का केंद्र बनने वाला है। देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने की उम्मीद है।
मीठे रीठों की अनोखी आस्था
रीठा साहिब केवल एक गुरुद्वारा नहीं, बल्कि आस्था और चमत्कार का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि गुरु नानक देव जी अपने शिष्य मरदाना के साथ यहां पहुंचे थे। उस समय यहां लगे रीठे स्वभाव से कड़वे थे, लेकिन गुरु नानक देव जी के आशीर्वाद के बाद वे मीठे हो गए। तभी से यह स्थान “मीठे रीठों” के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हो गया। आज भी श्रद्धालु यहां प्रसाद के रूप में मीठे रीठे प्राप्त करते हैं और इसे विशेष आशीर्वाद मानते हैं।
तीन दिन चलेगा भक्ति और सेवा का महोत्सव
29 मई से 31 मई तक चलने वाले इस वार्षिक जोड़ मेले में लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। गुरुद्वारा परिसर और आसपास के क्षेत्रों में तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। जगह-जगह लंगर की व्यवस्था की गई है, जहां श्रद्धालुओं को लगातार भोजन और प्रसाद वितरित किया जाएगा। कार सेवा के लिए विभिन्न राज्यों से सेवक पहुंचने लगे हैं। मेले में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए अस्थायी दुकानें, विश्राम स्थल और सहायता केंद्र भी बनाए जा रहे हैं।
मेले को शांतिपूर्ण और व्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए पुलिस प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। पर्वतीय और संकरे मार्गों को देखते हुए भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक लगाई जाएगी। बड़े वाहनों के लिए अलग पार्किंग स्थल निर्धारित किए गए हैं, जहां से श्रद्धालुओं को छोटे वाहनों के माध्यम से गुरुद्वारे तक पहुंचाया जाएगा।
भीड़ नियंत्रण, यातायात प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया जा रहा है। जल स्रोतों के पास भी सुरक्षा कर्मियों की निगरानी रहेगी ताकि किसी प्रकार की दुर्घटना न हो।
श्रद्धालुओं से नियमों के पालन की अपील
प्रशासन ने विशेष रूप से दोपहिया वाहनों से आने वाले श्रद्धालुओं से यातायात नियमों का पालन करने की अपील की है। साथ ही सहायता और आपातकालीन सेवाओं के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं।
हर वर्ष की तरह इस बार भी रीठा साहिब का जोड़ मेला श्रद्धा, सेवा और भाईचारे का संदेश लेकर आने वाला है। पहाड़ों की शांत वादियों में लगने वाला यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

