“जी रया, जागी रया…”। सावन संक्रांति की सुबह जैसे ही कुमाऊं के किसी घर में यह आशीर्वाद सुनाई देता है, समझ लीजिए कि हरेला आ चुका है। बुजुर्ग अपने हाथों से उगाए गए कोमल हरे तिनकों को बच्चों और परिवार के सदस्यों के सिर पर रखते हैं और उनके सुख, समृद्धि, दीर्घायु तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। यह दृश्य केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही उस लोकसंस्कृति का जीवंत रूप है, जिसने मनुष्य और प्रकृति के रिश्ते को पूजा का दर्जा दिया।
उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में मनाया जाने वाला हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक ऐसी लोकपरंपरा है, जो हमें यह सिखाती है कि धरती, जल, जंगल और खेती के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि हरेला को कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान और प्रकृति का सबसे बड़ा लोकपर्व माना जाता है।
‘हरेला’ शब्द का अर्थ ही है कि हरियाली, नवजीवन और नई शुरुआत। यह पर्व वर्ष में तीन बार चैत्र, सावन और आश्विन मनाया जाता है, लेकिन सावन संक्रांति का हरेला सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका कारण यह है कि यही वह समय होता है जब वर्षा ऋतु पूरे यौवन पर होती है, खेत नई फसल के लिए तैयार होते हैं और प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है। किसान अच्छी वर्षा, भरपूर पैदावार और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
धार्मिक दृष्टि से भी इस पर्व का विशेष महत्व है। लोकमान्यता है कि सावन भगवान शिव का प्रिय महीना है और इसी काल में भगवान शिव तथा माता पार्वती के दिव्य मिलन का स्मरण किया जाता है। इसलिए हरेला को शिव-पार्वती के मंगलमय जीवन, पारिवारिक सुख और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। यही कारण है कि इस पर्व में पूजा, प्रकृति और परिवार तीनों का अद्भुत संगम दिखाई देता है।
हरेला की तैयारी संक्रांति से पूरे नौ दिन पहले शुरू हो जाती है। घर के मंदिर या किसी पवित्र स्थान पर मिट्टी से भरे एक पात्र, टोकरे या तिनार में सात प्रकार के अनाज गेहूं, जौ, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट बोए जाते हैं। इन बीजों पर प्रतिदिन जल छिड़का जाता है और उन्हें सीधी धूप से बचाकर रखा जाता है। नौ दिनों में इनसे निकलने वाली कोमल पीली-हरी पौध जीवन, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है। यह परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि छोटी-सी देखभाल और धैर्य से ही जीवन फलता-फूलता है।
हरेला से एक दिन पहले घरों में मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती, श्रीगणेश और कार्तिकेय की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, जिन्हें कुमाऊंनी भाषा में डिकारे कहा जाता है। इन प्रतिमाओं को प्राकृतिक रंगों से सजाया जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोककला और हस्तशिल्प को भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रखने का माध्यम है।
सावन संक्रांति की सुबह सबसे पहले हरेले को काटकर देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसके बाद घर के बुजुर्ग परिवार के प्रत्येक सदस्य के सिर और कानों पर हरेला रखते हुए आशीर्वाद देते हैं—
- “जी रया, जागी रया, यो दिन बार-बार भेंटने रया।
- स्यावेक जसी बुद्धि हो, बाघक जसो त्राण हो।
- धरती जसो धीरज हो, आकाश जसो उच्च हो।
- दूब जस पनपिया, सिल जस पिठिया।”
यह केवल आशीर्वाद नहीं, बल्कि जीवन का संपूर्ण दर्शन है। इसमें लंबी आयु, विवेक, साहस, धैर्य, ऊंचे विचार और निरंतर प्रगति की कामना की जाती है। यही कारण है कि हरेला केवल एक पारिवारिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संस्कारों के हस्तांतरण का अवसर भी बन जाता है।
हरेला मूल रूप से कृषि संस्कृति का पर्व है। पहाड़ का जीवन सदियों से खेती, जंगल और जलस्रोतों पर आधारित रहा है। अच्छी वर्षा, उपजाऊ खेत और सुरक्षित वन ही लोगों की खुशहाली का आधार रहे हैं। इसलिए इस पर्व के माध्यम से किसान प्रकृति का आभार व्यक्त करते हैं और आने वाली फसल के लिए मंगलकामना करते हैं। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अन्न खेत से आता है और खेत प्रकृति की कृपा से हरे-भरे रहते हैं।
आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, घटते जंगल और बढ़ते प्रदूषण की चुनौती से जूझ रही है, तब हरेला पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। उत्तराखंड में इस दिन बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जाता है। विद्यालयों, सरकारी संस्थानों, सामाजिक संगठनों और ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पौधे लगाकर उन्हें संरक्षित करने का संकल्प लेते हैं। वास्तव में हरेला हमें यह सिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार होना चाहिए।
बदलते समय में भले ही जीवनशैली बदल गई हो, लेकिन हरेला आज भी कुमाऊं के लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े हुए है। जो लोग रोजगार या शिक्षा के लिए देश-विदेश में रहते हैं, वे भी इस पर्व पर अपने गांव, अपने घर और अपनी मिट्टी को याद करते हैं। यही इस लोकपर्व की सबसे बड़ी शक्ति है कि यह दूरी बढ़ने पर भी रिश्तों और परंपराओं को जीवित रखता है।
हरेला का सबसे बड़ा संदेश यही है कि प्रकृति से प्रेम केवल शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से होना चाहिए। यदि हर परिवार हर वर्ष एक पौधा लगाए, उसकी देखभाल करे और आने वाली पीढ़ी को प्रकृति के प्रति यही संस्कार दे, तो पर्यावरण संरक्षण किसी अभियान का नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाएगा।
इसीलिए हरेला केवल कुमाऊं का एक लोकपर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, परिवार और भविष्य के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी का उत्सव है। जब भी किसी घर में “जी रया, जागी रया…” की गूंज सुनाई देती है, तब केवल आशीर्वाद नहीं दिया जाता, बल्कि यह संकल्प भी दोहराया जाता है कि धरती हरी रहेगी, तभी जीवन भी हरा-भरा रहेगा।


