दिल्ली पुलिस द्वारा 31 साल पुराने अपहरण और हत्याकांड के आरोपी सलीम वास्तिक उर्फ सलीम खान की गिरफ्तारी ने न सिर्फ एक जघन्य अपराध की परतें खोली हैं, बल्कि हमारे कानून-व्यवस्था तंत्र की कई गंभीर कमजोरियों को भी उजागर कर दिया है। यह मामला केवल एक अपराधी के पकड़े जाने की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भी कहानी है जो दशकों तक एक दोषी को पहचान नहीं सका या यूं कहें कि पहचान कर भी पकड़ नहीं पाया।
1995 में एक 13 वर्षीय मासूम का अपहरण, फिरौती की मांग और अंततः निर्मम हत्या। यह अपराध अपने आप में ही समाज को झकझोर देने वाला था। अदालत ने 1997 में दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन 2000 में अंतरिम जमानत मिलने के बाद सलीम का फरार हो जाना और फिर 26 साल तक कानून की पकड़ से बाहर रहना, न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि आरोपी ने खुद को “मृत” घोषित करवा दिया और नई पहचान के साथ सामान्य जीवन जीता रहा। इतना ही नहीं, वह सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर एक यूट्यूबर के रूप में पहचान और लोकप्रियता भी हासिल करता रहा। यह दर्शाता है कि डिजिटल युग में पहचान बदलना और समाज में घुल-मिल जाना कितना आसान हो गया है, जबकि निगरानी तंत्र उतना मजबूत नहीं बन पाया।
यह मामला कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए भी एक सबक है। वर्षों बाद क्राइम ब्रांच द्वारा तकनीकी साक्ष्यों, फिंगरप्रिंट और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर आरोपी तक पहुंचना सराहनीय जरूर है, लेकिन यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या यह कार्रवाई पहले नहीं हो सकती थी? क्या हमारी एजेंसियों के पास फरार अपराधियों की निगरानी के लिए पर्याप्त और प्रभावी तंत्र मौजूद है?
इस केस का एक और चिंताजनक पहलू समाज की संवेदनशीलता से जुड़ा है। एक व्यक्ति, जो एक जघन्य हत्या का दोषी है, वही व्यक्ति बाद में सहानुभूति बटोरता है, सोशल मीडिया पर प्रभाव बनाता है और यहां तक कि उसकी जिंदगी पर बायोपिक बनाने की बात होती है। यह स्थिति बताती है कि हम सतही छवि के आधार पर कितनी जल्दी विश्वास कर लेते हैं, बिना अतीत की सच्चाई जाने।
अब जरूरत है कि इस मामले को केवल एक गिरफ्तारी तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इससे व्यापक सुधार की दिशा में कदम उठाए जाएं। जमानत प्रणाली की समीक्षा, फरार अपराधियों की डिजिटल ट्रैकिंग, और पहचान सत्यापन की मजबूत व्यवस्था, ये सभी ऐसे बिंदु हैं जिन पर गंभीरता से काम करना होगा।
अंततः यह मामला हमें याद दिलाता है कि न्याय में देरी भले हो जाए, लेकिन अगर सिस्टम जागरूक और प्रतिबद्ध हो, तो सच सामने आ ही जाता है। सवाल यह है कि क्या हम इस सच से सबक लेकर भविष्य में ऐसी चूक को रोक पाएंगे?

