“बमों के साए में ज़िंदगी: युद्ध, डर, महंगाई और टूटते सपनों की कहानी”

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तेहरान की ‘सेतारेह’ के लिए युद्ध पहले सिर्फ दूर कहीं हो रही एक घटना था। लेकिन एक दिन अचानक आई तेज़ धमाके की आवाज़ ने उनकी दुनिया बदल दी। ऑफिस की दीवारों तक पहुँचे उस कंपन ने यह एहसास करा दिया कि अब युद्ध दूर नहीं, उनके दरवाज़े पर है।

घबराहट में वह छत पर भागीं तो आसमान में उठता धुआँ दिखाई दिया। नीचे ऑफिस में अफरा-तफरी मच गई लोग चीख रहे थे, भाग रहे थे। कुछ ही घंटों में सब बदल गया। उसी दिन कंपनी बंद हुई और सेतारेह की नौकरी चली गई।

जो जिंदगी कभी सामान्य थी दोस्त, काम और हर हफ्ते मिलने वाली सैलरी अब डर और अनिश्चितता में बदल चुकी है। सेतारेह बताती हैं कि अब वह कई-कई रातों तक सो नहीं पातीं। बमबारी की आवाज़ें, भविष्य की चिंता और आर्थिक तंगी ने उनकी मानसिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। वह कहती हैं, “मैं कई दिनों से सोई नहीं हूं। दवाइयों के सहारे नींद लाने की कोशिश करती हूं, लेकिन डर और घबराहट खत्म नहीं होती।”

सेतारेह अकेली नहीं हैं। लाखों ईरानी इसी दौर से गुजर रहे हैं। पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर युद्ध ने और चोट की है। महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि ज़रूरी सामान भी आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गया है। लोग अपनी बचत खत्म कर चुके हैं, और अब उधार लेने के लिए भी कोई सहारा नहीं बचा। इस आर्थिक संकट के साथ-साथ मानसिक दबाव भी बढ़ता जा रहा है। हर दिन अनिश्चितता, हर रात डर—यह स्थिति लोगों को भीतर से तोड़ रही है।

दूसरी ओर, तेहरान के पास एक अस्पताल में काम कर रहीं नर्स ‘टीना’ युद्ध की भयावह सच्चाई को रोज़ करीब से देख रही हैं। वह बताती हैं कि धीरे-धीरे दवाइयों की कमी शुरू हो रही है और अगर हालात ऐसे ही रहे, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। टीना की आँखों के सामने रोज़ ऐसे मंजर आते हैं, जिन्हें भूल पाना मुश्किल है बमबारी में घायल लोग, पहचान से परे शव और अधूरी रह गई ज़िंदगियां।

वह एक गर्भवती महिला की घटना याद करते हुए कहती हैं, “वह अपने बच्चे को जन्म देने से सिर्फ दो महीने दूर थीं, लेकिन बमबारी में माँ और बच्चा दोनों नहीं बच पाए। यह बहुत भयानक था।”

यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि युद्ध की उस क्रूर सच्चाई का प्रतीक है, जिसमें सबसे ज्यादा पीड़ा निर्दोष लोगों को झेलनी पड़ती है। इतिहास भी जैसे खुद को दोहराता नजर आ रहा है। 1980 के दशक के ईरान-इराक युद्ध की कहानियां, जो कभी बीती बात लगती थीं, अब वर्तमान की हकीकत बन चुकी हैं।

वहीं, ‘बेहनाम’ जैसे लोग, जो पहले ही सरकारी दमन का शिकार हो चुके हैं, एक और भय के साथ जी रहे हैं। वह मानते हैं कि अगर हालात बिगड़े, तो सरकार फिर से हिंसा का सहारा ले सकती है।

वह कहते हैं, “जब आप देख लेते हैं कि ज़िंदगी कितनी आसानी से खत्म हो सकती है, तो उसके बाद सब कुछ बदल जाता है।” युद्ध ने केवल घर और शहर ही नहीं, बल्कि लोगों के भीतर के विश्वास और सुरक्षा की भावना को भी तोड़ दिया है। डर, गुस्सा और हताशा अब समाज के हर हिस्से में दिखाई दे रहे हैं।

आर्थिक तंगी, बेरोज़गारी और बढ़ता असंतोष यह संकेत दे रहे हैं कि असली संकट अभी बाकी है। कई लोग मानते हैं कि अगर युद्ध खत्म भी हो गया, तो उसके बाद सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष और तेज़ हो सकता है। आज ईरान में एक पूरी पीढ़ी ऐसी स्थिति में जी रही है, जहाँ हर दिन अनिश्चित है और हर रात डर के साये में गुजरती है।

यह कहानी सिर्फ एक देश की नहीं, बल्कि उस सच्चाई की है कि युद्ध कभी किसी का भला नहीं करता। यह केवल तबाही, दर्द और टूटते सपनों की विरासत छोड़ जाता है जिसकी कीमत सबसे ज्यादा आम लोग चुकाते हैं।