2027 की तस्वीर अभी से साफ…? सर्वे ने बढ़ाई भाजपा की बढ़त, कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती

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उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की अभी घोषणा नहीं हुई है, लेकिन सियासी तस्वीर को लेकर सामने आए एक सर्वे ने राजनीतिक बहस जरूर तेज कर दी है। सर्वे के आंकड़े सही साबित हुए तो 2027 में मुकाबला कांटे का नहीं, बल्कि भाजपा के पक्ष में काफी एकतरफा हो सकता है। सर्वे में भाजपा को 70 में से 54 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है, जबकि कांग्रेस को केवल 14 सीटों पर सिमटता बताया गया है। यानी मौजूदा अनुमान भाजपा को बहुमत के लिए जरूरी 36 सीटों से 18 सीट आगे दिखा रहा है।

लेकिन इस सर्वे की असली कहानी केवल 54 और 14 के आंकड़े में नहीं है। सवाल यह है कि आखिर चुनाव से एक साल पहले भाजपा के पक्ष में ऐसा माहौल क्यों दिखाई दे रहा है और क्या कांग्रेस के पास इसे बदलने के लिए पर्याप्त समय है?

सर्वे में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की स्वीकार्यता को भाजपा की संभावित बढ़त से जोड़कर देखा गया है। खास बात यह है कि समर्थन किसी एक आयु या सामाजिक वर्ग तक सीमित नहीं बताया गया है। अलग-अलग सामाजिक वर्गों में धामी को 45 प्रतिशत से अधिक समर्थन मिलने का दावा किया गया है।

सर्वे के अनुसार वैश्य वर्ग में धामी को 57.3 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग में 50.6 प्रतिशत, पंजाबी-सिख वर्ग में 49.7 प्रतिशत, ब्राह्मण वर्ग में 46.3 प्रतिशत, राजपूत वर्ग में 46.1 प्रतिशत और अनुसूचित जाति वर्ग में 45.3 प्रतिशत समर्थन मिलने का अनुमान है।

अगर उम्र के आंकड़ों को देखें तो भी तस्वीर भाजपा के लिए राहत वाली है। सर्वे में 18 से 25 वर्ष के युवाओं में धामी को 37.8 प्रतिशत समर्थन का दावा किया गया है। 26 से 35 वर्ष में यह 43 प्रतिशत, 36 से 50 वर्ष में 46.8 प्रतिशत और 51 से 60 वर्ष में 50.3 प्रतिशत बताया गया है। 60 वर्ष से अधिक आयु वर्ग में समर्थन 51.8 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।

युवा वर्ग चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है। इसलिए 18 से 35 वर्ष के मतदाताओं के बीच सरकार की स्वीकार्यता भाजपा के लिए महत्वपूर्ण संकेत मानी जा सकती है। हालांकि यही वह वर्ग भी है, जिसके बीच रोजगार और पलायन जैसे सवाल चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकते हैं।

सर्वे में महिला आरक्षण से जुड़े सरकार के फैसले को 88 प्रतिशत लोगों का पूर्ण समर्थन मिलने का दावा किया गया है। वहीं उत्तराखंड की पहचान और मूल स्वरूप को बचाने के प्रयासों के पक्ष में 70 प्रतिशत लोगों के होने की बात कही गई है।

समान नागरिक संहिता, नकल विरोधी कानून, महिला सशक्तीकरण, विकास और सुशासन जैसे मुद्दों को भी सरकार की स्वीकार्यता से जोड़कर देखा गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा 2027 के चुनाव में विकास के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बनाए रख सकती है।

कांग्रेस : सवाल सिर्फ सत्ता में वापसी का नहीं

सर्वे कांग्रेस के लिए केवल सीटों का आंकड़ा नहीं, बल्कि राजनीतिक चुनौती का संकेत भी है। यदि मौजूदा रुझान चुनाव तक कायम रहता है तो कांग्रेस को केवल भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार उतारने से आगे बढ़कर मतदाताओं के बीच सरकार का विकल्प बनने का भरोसा पैदा करना होगा।

उसे बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, विकास और स्थानीय समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाना होगा। साथ ही यह भी तय करना होगा कि चुनावी लड़ाई किन मुद्दों और किस नेतृत्व के चेहरे के आसपास लड़ी जाएगी।

हालांकि इन आंकड़ों को चुनावी नतीजे मानना जल्दबाजी होगी। विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक समीकरण कई बार बदल सकते हैं। सरकार के कामकाज को लेकर जनता की धारणा, विपक्ष की रणनीति, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों का चयन और चुनाव से पहले बनने वाले नए राजनीतिक समीकरण नतीजों पर असर डाल सकते हैं।

फिलहाल सर्वे ने भाजपा को बढ़त और कांग्रेस को चुनौती वाली स्थिति में जरूर खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इस बढ़त को चुनाव तक कायम रख पाती है या कांग्रेस अगले एक वर्ष में इस शुरुआती तस्वीर को बदलने में सफल होती है।