
विघ्नों को हरने वाले, बुद्धि-विवेक और शुभारंभ के देवता भगवान गणेश के स्वागत का दिन आ गया है। सोमवार को भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के साथ देशभर में गणेश चतुर्थी मनाई जाएगी। घरों से लेकर पूजा पंडालों तक गणपति बप्पा की प्रतिमाएं स्थापित होंगी और विधि-विधान से पूजा-अर्चना शुरू होगी। श्रद्धालु बप्पा को दूर्वा, फूल, मोदक, लड्डू और फल अर्पित कर परिवार के सुख-समृद्धि तथा जीवन के विघ्न दूर होने की कामना करेंगे। गणेश चतुर्थी केवल एक दिन का पर्व नहीं, बल्कि श्रद्धा, उत्सव और सामूहिक भक्ति की ऐसी परंपरा है, जिसका समापन अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन के साथ होता है।
हिंदू पंचांग के अनुसार गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ था। इसलिए यह तिथि गणेशजी के जन्मोत्सव के रूप में विशेष महत्व रखती है।
इस वर्ष गणेश चतुर्थी की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर की सुबह 7:06 बजे शुरू होकर 15 सितंबर की सुबह 7:44 बजे तक रहेगी। नई दिल्ली में गणपति स्थापना और मध्याह्न पूजा का शुभ समय सुबह 11:02 बजे से दोपहर 1:31 बजे तक है। अलग-अलग शहरों में स्थानीय सूर्योदय और पंचांग गणना के कारण मुहूर्त में कुछ अंतर हो सकता है।
गणेश उत्सव की अवधि परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। अनेक स्थानों पर गणपति की स्थापना डेढ़ दिन, पांच, सात या दस दिन के लिए की जाती है। दस दिवसीय उत्सव का समापन अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन के साथ होता है। इस वर्ष गणेश विसर्जन की प्रमुख तिथि 25 सितंबर है।
गणेश चतुर्थी कब से मनाई जा रही है?
गणेश उपासना की परंपरा बहुत प्राचीन है। हालांकि आज जिस बड़े सार्वजनिक गणेशोत्सव को देशभर में देखा जाता है, उसका आधुनिक स्वरूप अपेक्षाकृत नया है। महाराष्ट्र में गणेश उत्सव की सार्वजनिक परंपरा की जड़ें मराठा और पेशवा काल तक जाती हैं। 19वीं सदी में यह उत्सव काफी हद तक पारिवारिक स्वरूप में सीमित हो गया था।
1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को बड़े सार्वजनिक आयोजन का स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका उद्देश्य धार्मिक आयोजन के साथ समाज को एक मंच पर लाना और लोगों में एकता की भावना मजबूत करना भी था। इसलिए आज के सार्वजनिक गणेशोत्सव के इतिहास में वर्ष 1893 का विशेष महत्व माना जाता है।
गणपति स्थापना की विधि
गणेश चतुर्थी के दिन सुबह स्नान के बाद पूजा स्थल की सफाई कर स्वच्छ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाया जाता है। चौकी पर अक्षत रखकर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है। प्रतिमा का मुख सामान्यतः पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना शुभ माना जाता है।
प्रतिमा की शुद्धि के बाद गणेशजी को रोली या चंदन का तिलक लगाया जाता है। इसके बाद फूल, दूर्वा और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। पास में जल से भरा कलश स्थापित कर उसमें आम के पत्ते, अक्षत, सुपारी और सिक्का रखने तथा ऊपर नारियल स्थापित करने की परंपरा है।




