35 रुपये की मजदूरी से सिनेमा के शिखर तक… नाना पाटेकर की वो कहानी, जिसमें संघर्ष भी था, जुनून भी और देशसेवा भी

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पर्दे पर जब नाना पाटेकर बोलते थे तो सिर्फ संवाद नहीं सुनाई देता था, एक किरदार सांस लेता हुआ महसूस होता था। कभी परिंदा का खतरनाक गैंगस्टर, कभी क्रांतिवीर का विद्रोही आम आदमी, कभी प्रहार का सैनिक और कभी वेलकम का उदय शेट्टी, नाना ने अभिनय की कोई एक परिभाषा स्वीकार नहीं की। उन्होंने नायक, खलनायक, चरित्र अभिनेता और हास्य कलाकार के बीच की सीमाएं ही मिटा दीं। 8 अक्टूबर को 75 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ हिंदी और मराठी सिनेमा ने सिर्फ एक कलाकार नहीं, अपनी एक अलग आवाज खो दी। गोवा स्थित उनके आवास पर गंभीर कार्डियक अरेस्ट के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया। करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने की कोशिश हुई, लेकिन सुबह करीब 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

मुरुड-जंजीरा में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर

1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में जन्मे नाना का बचपन किसी फिल्मी परिवार की चकाचौंध में नहीं बीता। उनके पिता को थिएटर पसंद था और यहीं से नाना के भीतर अभिनय की रुचि पैदा हुई। आगे चलकर उन्होंने मुंबई के सर जे.जे. स्कूल ऑफ एप्लाइड आर्ट से पढ़ाई की और रंगमंच से जुड़ गए। नाना नाम कैसे पड़ा, उनके जीवन की उन छोटी लेकिन दिलचस्प बातों में है जिन्हें उनकी कहानी में अलग से जगह मिलती है। विश्वनाथ धीरे-धीरे थिएटर और फिल्मों की दुनिया में ‘नाना’ के नाम से पहचाने जाने लगे।

35 रुपये के लिए पैदल चलने वाला कलाकार

आज जिस अभिनेता की एक पहचान करोड़ों रुपये की फिल्मों से जुड़ी रही, उसके शुरुआती दिनों की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। संघर्ष के दौर में नाना ने 35 रुपये की मजदूरी के लिए करीब आठ किलोमीटर पैदल जाने की बात बताई थी। भूख और अभाव उनके जीवन का हिस्सा रहे। यही वजह रही कि बाद में उनके अभिनय में आम आदमी की बेचैनी और संघर्ष बनावटी नहीं लगा।

रंगमंच पर अपने अभिनय को तराशने के बाद 1978 में गमन से उन्होंने फिल्मों में कदम रखा। शुरुआत आसान नहीं थी। कई फिल्मों में छोटे-बड़े किरदार करते हुए वह धीरे-धीरे अपनी जगह बनाते गए। हिंदी और मराठी सिनेमा दोनों में काम करते हुए उनकी पहचान एक ऐसे अभिनेता की बनी जो पारंपरिक हीरो की शक्ल-सूरत से नहीं, अभिनय की ताकत से स्टार बन सकता था।

‘परिंदा’ ने बदल दी पूरी तस्वीर

1989 की परिंदा नाना के करियर का बड़ा मोड़ बनी। गैंगस्टर के किरदार में उनकी तीखी और भय पैदा करने वाली अदाकारी ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। फिल्म की शूटिंग के दौरान भी उन्होंने गंभीर जोखिम झेले; एक वास्तविक आग वाले दृश्य में वह झुलस गए और लंबे इलाज से गुजरे। सलाम बॉम्बे! की शूटिंग के दौरान उनके साथ चाकू लगने की घटना का भी उल्लेख मिलता है।

अभिनेता से निर्देशक बने

1991 में प्रहार : द फाइनल अटैक से नाना ने निर्देशन की दुनिया में भी कदम रखा। इस फिल्म की तैयारी ने उनकी जिंदगी को एक और असाधारण दिशा दी। फिल्म के लिए उन्होंने लंबा सैन्य प्रशिक्षण लिया। यही प्रशिक्षण बाद में उनके वास्तविक जीवन में भी काम आया।

नाना पाटेकर की जिंदगी का यह अध्याय उन्हें दूसरे फिल्म कलाकारों से अलग करता है। सैन्य प्रशिक्षण के बाद वह प्रादेशिक सेना से जुड़े। 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने सेना के साथ सेवा की। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने सीमा क्षेत्र में जवानों के साथ समय बिताया और अस्पतालों में घायल सैनिकों से भी मुलाकात की।

‘क्रांतिवीर’: 1994 की क्रांतिवीर में प्रताप नारायण तिलक का किरदार नाना के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में रहा। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी इस सम्मान के पीछे उनके अभिनय की विशेष रूप से प्रशंसा की गई है। इसके बाद अग्निसाक्षी, तिरंगा, खामोशी : द म्यूजिकल, अब तक छप्पन, अपहरण और राजनीति जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग दिखाए। जिस अभिनेता ने गंभीर और हिंसक किरदारों से पहचान बनाई थी, वही वेलकम में उदय शेट्टी बनकर दर्शकों को खूब हंसाने लगा। 

नाना ने नीलकांति से शादी की थी। उनके बेटे मल्हार पाटेकर हैं। उनकी निजी जिंदगी हमेशा सुर्खियों से दूर नहीं रही, लेकिन उन्होंने परिवार को लेकर सार्वजनिक जीवन में अपेक्षाकृत कम बात की। उनकी शादी से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह भी सामने आया कि उन्होंने महज 750 रुपये में शादी की थी।

किसानों के लिए भी उठाई आवाज

फिल्मों से बाहर नाना का एक बड़ा पक्ष समाजसेवा का था। 2015 में अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने NAAM Foundation शुरू की। महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त गांवों, पानी की समस्या और किसानों के संकट को लेकर संस्था ने काम किया। फाउंडेशन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उसका उद्देश्य ग्रामीण विकास, जल संरक्षण और किसानों की परेशानियों को कम करना है।

नाना को क्रिकेट से भी खास लगाव था। बचपन में वह ऑफ स्पिन गेंदबाजी करते थे। क्रिकेट के प्रति उनकी दीवानगी और विराट कोहली को लेकर उनका उत्साह भी कई बार खबरों में आया। इस पहलू ने उनके व्यक्तित्व का एक बिल्कुल अलग चेहरा दिखाया, पर्दे पर गंभीर दिखने वाला अभिनेता खेल के मैदान की बात आते ही बिल्कुल आम क्रिकेट प्रशंसक बन जाता था।

उम्र बढ़ने के बावजूद नाना ने अभिनय से दूरी नहीं बनाई। 2026 में ओ रोमियो में उनकी मौजूदगी चर्चा में रही। उनके करियर की आखिरी फिल्मों में सूबेदार का नाम भी सामने आया है।

मौत से महज चार दिन पहले, 4 अक्टूबर को वह गोवा में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में नजर आए थे। वहां उन्होंने जिंदगी और समय को लेकर बात की थी। उस वक्त कही गई उनकी बातें उनके निधन के बाद और ज्यादा मार्मिक लग रही हैं।