टीएमसी में भगदड़ या बदलाव की बयार? 100 से अधिक पार्षदों के इस्तीफे, भाजपा मंच पर दिखे सांसद-विधायक, बंगाल की राजनीति में नए समीकरणों के संकेत

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों असामान्य हलचल देखने को मिल रही है। विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पराजय के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और संगठनात्मक संकट के संकेत लगातार सामने आ रहे हैं। ताजा घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है, जब टीएमसी सांसद काकोली घोष दस्तिदार समेत पार्टी के छह विधायक मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की प्रशासनिक समीक्षा बैठक में शामिल हुए। इसे केवल एक सरकारी बैठक नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

काकोली घोष ने हाल ही में टीएमसी के बारासात संगठनात्मक जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। इससे पहले उन्हें संसदीय दल के मुख्य सचेतक पद से हटाए जाने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी। ऐसे में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की बैठक में उनकी मौजूदगी ने अटकलों को और तेज कर दिया है। बैठक में देगंगा के विधायक अनीसुर रहमान बिस्वास, स्वरूपनगर की बीना मंडल, हरोआ के मोहम्मद अब्दुल मतीन सहित कुल छह टीएमसी विधायक उपस्थित रहे।

हालांकि बैठक में शामिल नेताओं ने इसे अपने-अपने क्षेत्रों के विकास से जुड़ा कदम बताया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम टीएमसी के भीतर बढ़ती बेचैनी और नेतृत्व से असंतोष का संकेत भी हो सकता है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इसे नई राजनीतिक संस्कृति करार देते हुए कहा कि उनकी सरकार विकास के मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर चलना चाहती है।

इस बीच नगर निकायों में भी टीएमसी की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही हैं। विभिन्न नगरपालिकाओं के 100 से अधिक पार्षदों के इस्तीफे की खबरों ने पार्टी संगठन की चिंता बढ़ा दी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यह सिलसिला जारी रहा तो अगले वर्ष प्रस्तावित नगर निकाय चुनावों से पहले कई नगरपालिका बोर्ड भंग होने की स्थिति पैदा हो सकती है। इससे भाजपा को उन क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिल सकता है, जो अब तक टीएमसी का मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर चल रही असहमति केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। कोलकाता नगर निगम और राज्य संगठन के कई वरिष्ठ नेताओं को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म है। हालांकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में पार्षदों से इस्तीफा न देने और संगठन को मजबूत बनाए रखने की अपील की थी, लेकिन जमीनी स्तर पर उठ रहे सवाल और बढ़ती नाराजगी पार्टी नेतृत्व के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि 1998 में पार्टी गठन के बाद तृणमूल कांग्रेस ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां पहले से अलग नजर आ रही हैं। एक ओर संगठनात्मक असंतोष सामने आ रहा है तो दूसरी ओर विपक्षी भाजपा लगातार अपने राजनीतिक विस्तार की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में आने वाले महीनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति किस दिशा में जाएगी, इस पर पूरे देश की नजर बनी हुई है।