स्वतंत्रता दिवस पर विशेष: भारत की आजादी के गुमनाम सिपाही

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हल्द्वानी। 15 अगस्त को हम भारत का 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। राष्ट्रीय के प्रांतो में देशवासी शहीदों के जयकारों के साथ उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। आइए आजादी के इस पावन पर्व पर हम नमन करते हैं आजादी के उन मतवालों को जिन्हें हम अज्ञानतावस भूल चुके हैं।

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के कथन” हे माताओं! नारीत्व की रक्षा के लिए, तुम हथियार उठाओ…। न इस उदघोष ने दो क्रांतिपुत्रों के मन में देशभक्ति की अलख जगाई। 

       शहीद सुनीति चौधरी

सुनीति चौधुरी का जन्म २२ मई १९१७ को हुआ। वह भारत की एक क्रान्तिकारी बालिका थीं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में १४ वर्ष की अल्पायु में उन्होने अपनी सखी शान्ति घोष के साथ मिलकर एक अत्याचारी ब्रिटिश मजिस्ट्रेट की हत्या की थी। सुनीति उस समय के प्रसिद्ध दीपाली संघ की सदस्या थीं।

बात २४ दिसम्बर १९३१ की है। त्रिपुरा के फैजुन्निसा बालिका विद्यालय की दो छात्राओं कुमारी शांति घोष और कुमारी सुनीति चौधरी ने मजिस्ट्रेट बी जी स्टीवेंसन से मिलने की अनुमति मांगी। कारण पूछने पर उन्होंने उत्तर दिया की वो लड़कियों की तैराकी प्रतियोगिता के सन्दर्भ में उनसे कुछ बात करना चाहती हैं। मजिस्ट्रेट के कमरे में पंहुचते ही उन्होंने गोली चला दी। उन वीरांगनाओं का निशाना अचूक था, स्टीवेंसन वहीं मर गया। दोनों वीर बालाएं गिरफ्तार कर ली गयीं। २७ फ़रवरी १९३२ को उन्हें आमरण काला पानी का दंड हुआ। सत्तावनी क्रांति के बाद यह पहली घटना थी जिसमे किसी महिला ने राजनीतिक हत्या की।

              शहीद शांति घोष

22 नवंबर 1916 को बंगाल के कलकत्ता (अब कोलकाता) में शांति घोष का जन्म हुआ था। उनके पिता देबेंद्रनाथ घोष कोमिला के विक्टोरिया कालेज में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे। मातृभूमि के लिए समर्पण की भावना शांति में घर से ही जागृत हुई। प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही होने के बाद उनका दाखिला फजुनिस्सा गल्र्स स्कूल में कराया गया। वहीं उनकी मुलाकात प्रफुल्ल नलिनी ब्रह्मा से हुई। कम उम्र में ही शांति घोष ने छात्र राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1931 में वह गल्र्स स्टूडेंट्स एसोसिएशन की संस्थापक सदस्य होने के साथ-साथ सचिव भी निर्वाचित हुईं।

प्रफुल्ल नलिनी ब्रह्मा के जरिए ही वह युगांतर पार्टी से जुड़ीं। यह सिर्फ नाम की पार्टी थी, लेकिन इसका मूल उदेश्य तो क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देना था। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के कथन- हे माताओं! नारीत्व की रक्षा के लिए, तुम हथियार उठाओ…। नेताजी के इन कथनों ने तरुणी शांति घोष को क्रांतिकारी बनने के लिए प्रेरित किया। युगांतर पार्टी में सम्मिलित होने के पश्चात शांति ने तलवारबाजी और लाठी चलाने के साथ ही अन्य शस्त्रों का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।

प्रशिक्षण पूरा होने के पश्चात उनका चयन एक विशेष अभियान के लिए किया गया। इसमें उनकी सहपाठी रहीं सुनीति चौधरी को सहयोगी के रूप में सम्मिलित किया गया। यह पहला मौका था जब किसी महिला को क्रांतिकारी गतिविधि को अंजाम देने के लिए प्रत्यक्ष रूप से कार्य करने के लिए चुना गया। इससे पहले युगांतर पार्टी में महिलाएं पर्दे के पीछे रहकर ही क्रांतिकारियों की सहायता किया करती थीं। पहली बार यह तय किया गया कि महिलाएं पर्दे के पीछे से निकलकर सामने से अंग्रेजों का मुकाबला करेंगी। इनका मिशन था 23 मार्च 1931 को फांसी पर चढऩे वाले भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत का प्रतिशोध लेना।

लेखक गेराल्डिन फोब्र्स ने अपनी पुस्तक भारतीय महिला और स्वतंत्रता आंदोलन में शांति घोष और सुनीति चौधरी से की गई बातचीत का वर्णन करते हुए एक कविता, तू अब आजाद और प्रसिद्ध है के साथ दोनों क्रांति पुत्रियों की फोटो भी छापी। शांति घोष और सुनीति चौधरी द्वारा देश की स्वाधीनता में दिए गए योगदान के लिए हम भारतवासी सदैव उनके ऋणी रहेंगे।