उत्तराखंड बनने के 26 साल बाद भी पहाड़ के कई गांव सड़क जैसी बुनियादी सुविधा का इंतजार कर रहे हैं। सरकारें विकास और दुर्गम क्षेत्रों तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं व हेलीकॉप्टर सुविधा की बात करती हैं, लेकिन अल्मोड़ा के सल्ट क्षेत्र की यह घटना इन दावों पर सवाल खड़े करती है। सड़क न होने के कारण बीमार गीता देवी को डोली में बैठाकर साढ़े तीन किलोमीटर पैदल मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ा। इलाज के लिए उन्हें कई शहरों में ले जाया गया, लेकिन आखिरकार दिल्ली में उनकी मौत हो गई।
अल्मोड़ा जिले के सल्ट विकासखंड की जाख ग्रामसभा के पणचूरा गांव से सामने आई यह घटना पहाड़ की बदहाल बुनियादी सुविधाओं की दर्दनाक तस्वीर पेश करती है। यहां रहने वाली गीता देवी लंबे समय से बीमार थीं। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने और लगातार बारिश के कारण उन्हें समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका।
जब हालत ज्यादा गंभीर हो गई तो गांव के लोगों ने डोली तैयार की। खुशाल सिंह, दीपक सिंह, जगत सिंह सहित अन्य ग्रामीणों ने गीता देवी को डोली में बैठाकर करीब साढ़े तीन किलोमीटर पैदल चलकर भैरंगखाल मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
वहां से निजी वाहन के जरिए पहले उन्हें रामनगर, फिर गुरुग्राम ले जाया गया। हालत में सुधार नहीं होने पर उन्हें दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। उपचार के दौरान गीता देवी ने दम तोड़ दिया। परिजनों के अनुसार उनका पहले ऋषिकेश एम्स में भी इलाज चल चुका था।
यह पहली घटना नहीं है। इसी जाख ग्रामसभा में कुछ दिन पहले एक बुजुर्ग महिला का पैर टूटने पर ग्रामीणों ने खाट को स्ट्रेचर बनाकर कई किलोमीटर पैदल सड़क तक पहुंचाया था। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं यह बताती हैं कि उत्तराखंड के कई दूरस्थ गांव आज भी सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अलग राज्य बने 26 साल होने जा रहे हैं। इस दौरान पहाड़ के विकास, हर गांव तक सड़क, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और दुर्गम इलाकों के लिए हेलीकॉप्टर सेवा जैसे कई दावे किए गए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी कई ग्रामीणों को मरीजों को कंधों और डोली के सहारे अस्पताल तक पहुंचाना पड़ रहा है।
यह घटना केवल गीता देवी की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि उस पहाड़ का दर्द है जो आज भी पूछ रहा है।, क्या विकास के दावे अंतिम गांव तक पहुंच पाए हैं, या फिर पहाड़ के लोगों की जिंदगी अब भी सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के इंतजार में ही गुजर रही है?


