नई दिल्ली। पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि वहां इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से अधिक महत्व कट्टरपंथी दबावों को दिया जाता है। लाहौर की विभाजन-पूर्व पहचान को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से सड़कों, चौकों और मोहल्लों के पुराने ऐतिहासिक नाम बहाल करने की महत्वाकांक्षी योजना अब ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। चरमपंथी संगठनों और कट्टरपंथी समूहों के विरोध के बाद मरियम नवाज सरकार अपने ही फैसले से पीछे हटती नजर आ रही है।
दरअसल, लाहौर हेरिटेज एरिया रिवाइवल (LAHR) की बैठक में शहर के कई ऐतिहासिक स्थलों के पुराने नाम पुनर्स्थापित करने को मंजूरी दी गई थी। प्रस्ताव के अनुसार इस्लामपुरा को फिर से ‘कृष्ण नगर’, बाबरी मस्जिद चौक को ‘जैन मंदिर चौक’, सुन्नत नगर को ‘संत नगर’ और मुस्तफाबाद को ‘धरमपुरा’ नाम दिए जाने थे। इस निर्णय को लाहौर की बहुसांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान को सम्मान देने की दिशा में बड़ा कदम माना गया था।
हालांकि जैसे ही यह जानकारी सार्वजनिक हुई, कुछ कट्टरपंथी तत्वों और सोशल मीडिया समूहों ने इसे “हिंदू और सिख पहचान को बढ़ावा देने” का मुद्दा बनाकर विरोध शुरू कर दिया। बढ़ते दबाव के बीच पंजाब सरकार ने यू-टर्न लेते हुए कहा कि नाम परिवर्तन पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है और मामला विचाराधीन है।
लाहौर के डिप्टी कमिश्नर आर. मोहम्मद अली एजाज ने स्पष्ट किया कि सड़कों और गलियों के नाम बदलने का कोई औपचारिक फैसला अभी तक लागू नहीं किया गया है। इसके बाद यह साफ हो गया कि सरकार विरोध के सामने पीछे हट गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लाहौर की पहचान केवल एक शहर की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की कहानी है। लक्ष्मी चौक, जैन मंदिर रोड, राम गली, भगवानपुरा, शांति नगर, सुंदर दास रोड और कृष्ण नगर जैसे नाम उस इतिहास की याद दिलाते हैं, जिसे विभाजन के बाद धीरे-धीरे मिटाने की कोशिश की गई थी।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह घटनाक्रम पाकिस्तान में कट्टरपंथी प्रभाव की ताकत को भी उजागर करता है। एक ओर सरकार ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की बात करती है, वहीं दूसरी ओर विरोध की आहट मिलते ही अपने फैसलों से पीछे हट जाती है। इससे यह संदेश गया है कि पाकिस्तान में सांस्कृतिक विरासत की बहाली की राह अभी भी कट्टरपंथी राजनीति के साये से मुक्त नहीं हो पाई है।

