हिमाचल प्रदेश में चिट्टा और नशे के बढ़ते कारोबार के बीच सुक्खू सरकार का हालिया फैसला केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संदेश भी है। 21 पुलिस कर्मियों समेत 31 सरकारी कर्मचारियों को बर्खास्त करना यह दिखाता है कि सरकार अब नशे के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” नीति को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखना चाहती।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कार्रवाई केवल छोटे कर्मचारियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पुलिस विभाग के भीतर भी सख्ती दिखाई गई। आमतौर पर नशे के नेटवर्क पर सवाल उठते समय पुलिस और प्रशासन की भूमिका भी चर्चा में रहती है। ऐसे में पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई सरकार के लिए एक कठिन लेकिन जरूरी कदम माना जा सकता है।
हिमाचल जैसे शांत और पर्यटन आधारित राज्य में पिछले कुछ वर्षों में चिट्टे का कारोबार तेजी से फैला है। युवाओं में नशे की बढ़ती लत ने सामाजिक चिंता को गंभीर बना दिया है। स्कूलों और कॉलेजों तक “एंटी-चिट्टा जागरूकता अभियान” ले जाने का निर्णय इस बात का संकेत है कि सरकार अब केवल गिरफ्तारी तक सीमित रहने के बजाय सामाजिक स्तर पर भी लड़ाई लड़ना चाहती है।
हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल बर्खास्तगी और अभियान से नशे का नेटवर्क टूट पाएगा? क्योंकि चिट्टा कारोबार केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि बेरोजगारी, सीमावर्ती राज्यों से सप्लाई, युवाओं में बढ़ते तनाव और आसान कमाई की मानसिकता से भी जुड़ा विषय है। जब तक सप्लाई चेन, आर्थिक नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण पर एक साथ चोट नहीं होगी, तब तक यह लड़ाई अधूरी रहेगी।
सरकार ने फॉरेंसिक रिपोर्ट पांच दिन में देने, तस्करों की संपत्तियां ध्वस्त करने और अधिकारियों की जवाबदेही तय करने जैसे कदमों की घोषणा की है। यदि ये फैसले जमीन पर सख्ती से लागू होते हैं तो इसका असर दिख सकता है। लेकिन यदि यह अभियान भी केवल कुछ महीनों की कार्रवाई बनकर रह गया, तो समस्या फिर उसी जगह खड़ी दिखाई देगी।
हिमाचल के लिए यह समय केवल कार्रवाई का नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, पारदर्शी पुलिसिंग और युवाओं को सकारात्मक दिशा देने का भी है। चिट्टे के खिलाफ लड़ाई तभी सफल होगी जब सरकार, प्रशासन, परिवार और समाज सभी मिलकर इसे केवल अपराध नहीं बल्कि सामाजिक संकट मानकर लड़ें।
आखिर क्या होता है ‘चिट्टा’?
‘चिट्टा’ एक खतरनाक सिंथेटिक नशा माना जाता है, जिसे आम बोलचाल में हेरोइन या स्मैक के रूप में भी जाना जाता है। यह सफेद पाउडर जैसा पदार्थ होता है और बेहद तेजी से युवाओं को अपनी गिरफ्त में लेता है। पंजाब और हिमाचल समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में पिछले कुछ वर्षों में इसका नेटवर्क तेजी से फैला है।
विशेषज्ञों के अनुसार चिट्टे का सेवन करने वाले व्यक्ति को शुरुआत में नशे जैसी राहत महसूस होती है, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लत शरीर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को बुरी तरह प्रभावित करती है। लंबे समय तक सेवन से शरीर कमजोर होना, मानसिक तनाव, हिंसक व्यवहार और कई गंभीर बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।
पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के अनुसार चिट्टा तस्करी का नेटवर्क युवाओं को सबसे ज्यादा निशाना बनाता है, इसलिए स्कूल-कॉलेज स्तर पर जागरूकता अभियान को बेहद जरूरी माना जा रहा है।

