पटना की राजनीति में एक बार फिर वही दृश्य दोहराया गया, बस चेहरे बदल गए। कभी लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजप्रताप यादव को युवा उम्र में स्वास्थ्य मंत्री बनाकर सत्ता ने “राजनीतिक विरासत” का नया अध्याय लिखा था, और अब वर्षों तक राजनीति से दूर रहे नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार सीधे बिहार के स्वास्थ्य मंत्री बना दिए गए।
राजनीति के गलियारों में इसे “सामान्य प्रक्रिया” कहा जा रहा है, लेकिन गांवों की चौपाल, शहरों के चौराहों और बेरोजगार युवाओं के मन में एक ही सवाल घूम रहा है कि क्या राजनीति अब जनता की सेवा से ज्यादा परिवारों की विरासत बन चुकी है…?
जिस बिहार में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते-करते उम्र निकाल देते हैं, जहां नौकरी के लिए वर्षों संघर्ष करना पड़ता है, वहां सत्ता के गलियारों में “सरनेम” कई बार अनुभव से बड़ा साबित हो जाता है। दिलचस्प बात यह है कि जिन दलों ने वर्षों तक “परिवारवाद” को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रोग बताया, वही आज अपने परिवार को सत्ता के केंद्र में खड़ा करते दिखाई दे रहे हैं।
कल तक लालू परिवार पर तंज कसने वाले आज खुद उसी रास्ते पर चलते नजर आ रहे हैं। इसलिए सोशल मीडिया पर लोग इसे “सेम टू सेम राजनीति” कह रहे हैं। जनता यह भी देख रही है कि बिहार के सरकारी अस्पतालों में आज भी दवाइयों की कमी, डॉक्टरों की अनुपस्थिति और इलाज की बदहाल व्यवस्था बड़ी समस्या है। गांवों में मरीज एंबुलेंस के इंतजार में दम तोड़ देते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य मंत्रालय सिर्फ राजनीतिक संतुलन का विभाग नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी से जुड़ी जिम्मेदारी है।
यही कारण है कि निशांत कुमार की नियुक्ति पर चर्चा केवल “मंत्री कौन बना” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल को जन्म देती है कि क्या लोकतंत्र में अवसर संघर्ष से मिलेगा या परिवार से…?
राजनीति में परिवार से आना गलत नहीं माना जाता, लेकिन जनता यह जरूर चाहती है कि पद योग्यता, अनुभव और जनसंघर्ष से तय हों। क्योंकि आम युवक को राजनीति में जगह बनाने के लिए वर्षों सड़क पर संघर्ष करना पड़ता है, जबकि सत्ता के परिवारों के लिए मंत्री पद तक का रास्ता कई बार बेहद छोटा दिखता है।
बिहार की राजनीति अब ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां जनता नेताओं के भाषण नहीं, उनके आचरण की तुलना कर रही है और यही वजह है कि शायद लोग सोच रहे हैं कि “सत्ता बदली, चेहरे बदले… लेकिन राजनीति का ‘परिवार मॉडल’ नहीं बदला।”

