धर्मनगरी के रूप में विख्यात हरिद्वार से हाल ही में सामने आई एक घटना ने समाज को आईना दिखाने का काम किया है। ज्वालापुर क्षेत्र में अपने पुश्तैनी मकान में अकेली रह रही एक बुजुर्ग महिला का शव 10 से 15 दिन बाद घर के भीतर मिला। बेटों के बार-बार फोन करने पर भी जब संपर्क नहीं हो पाया, तब दरवाजा तोड़कर भीतर प्रवेश किया गया और यह दर्दनाक दृश्य सामने आया। यह केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक ढांचे की गंभीर चेतावनी है।
भागदौड़ की दुनिया और बिखरते परिवार
आज की प्रतिस्पर्धी जीवनशैली ने परिवार की पारंपरिक संरचना को कमजोर कर दिया है। रोजगार, करियर और बेहतर जीवन की तलाश में युवा पीढ़ी महानगरों की ओर पलायन कर रही है। माता-पिता गांवों और छोटे शहरों में अकेले रह जाते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद भावनात्मक रूप से वे असुरक्षित और उपेक्षित हो जाते हैं।
मोबाइल फोन और डिजिटल संपर्क ने दूरी कम करने का भ्रम जरूर पैदा किया है, लेकिन वास्तविक देखभाल का विकल्प आज भी कोई तकनीक नहीं बन सकी है। रोजाना एक कॉल कर लेना कर्तव्य की पूर्ति नहीं है। बुजुर्गों को साथ, संवाद और सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
सामाजिक जिम्मेदारी का क्षरण
यह प्रश्न केवल परिवारों तक सीमित नहीं है। पड़ोस, मोहल्ला और समाज भी अपनी जिम्मेदारियों से विमुख होते जा रहे हैं। यदि कोई बुजुर्ग कई दिनों तक घर से बाहर न दिखे या घर से दुर्गंध आए, तो क्या यह आसपास रहने वालों की संवेदनशीलता की परीक्षा नहीं है?
एक समय था जब मोहल्ले का हर व्यक्ति दूसरे के सुख-दुख में सहभागी होता था। आज शहरी जीवनशैली ने लोगों को आत्मकेंद्रित बना दिया है। परिणामस्वरूप ऐसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं, जहां बुजुर्गों की मौत का पता कई दिनों बाद चलता है।
प्रशासन और व्यवस्था की भूमिका
सरकारें वरिष्ठ नागरिकों के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित करती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनकी निगरानी और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न बना रहता है। स्थानीय प्रशासन, पुलिस और सामाजिक संगठनों को मिलकर ऐसे बुजुर्गों की पहचान करनी चाहिए जो अकेले रह रहे हैं। समय-समय पर उनका हालचाल लेना और आपात स्थिति में त्वरित सहायता सुनिश्चित करना जरूरी है।
नगर निकायों और सामाजिक संस्थाओं को वार्ड स्तर पर वरिष्ठ नागरिक पंजीकरण अभियान चलाना चाहिए, ताकि किसी भी असामान्य स्थिति में तुरंत कार्रवाई की जा सके।
आत्ममंथन की आवश्यकता
हरिद्वार की यह घटना केवल एक समाचार नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है। हमें यह तय करना होगा कि आधुनिकता की दौड़ में कहीं हम अपने मूल्यों और संबंधों को तो नहीं खो रहे।
बुजुर्ग हमारे अनुभव, संस्कार और परंपरा के जीवंत स्रोत हैं। यदि वे अपने ही घर में असुरक्षित और अकेले मरने को विवश हो रहे हैं, तो यह केवल एक परिवार की विफलता नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनहीनता का प्रतीक है।
समय आ गया है कि हम आर्थिक प्रगति के साथ-साथ मानवीय रिश्तों की भी रक्षा करें ताकि किसी भी घर का दरवाजा कई दिनों बाद टूटे और भीतर से सन्नाटा न मिले।

