कागजी नीतियां और लहूलुहान पहाड़

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पौड़ी के बरस्वार गांव में गुलदार के हमले में डेढ़ साल की मासूम बच्ची की मौत केवल एक दर्दनाक घटना नहीं, बल्कि उत्तराखंड के शासन-प्रशासन के लिए एक खुला आरोप पत्र है। यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता कि आखिर पहाड़ों में इंसान और जंगल को आमने-सामने खड़ा करने की ज़िम्मेदारी किसकी है?

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब ‘अपवाद’ नहीं, बल्कि नियम बन चुका है। हर साल दर्जनों लोग गुलदार, हाथी और भालू के हमलों में जान गंवा रहे हैं, लेकिन हर घटना के बाद सरकारी प्रतिक्रिया वही पुरानी—टीम भेजी गई, गश्त बढ़ाई गई, जांच के आदेश दिए गए। सवाल यह है कि क्या प्रशासन की संवेदनशीलता हर मौत के बाद ही जागती है?

विकास के नाम पर उजड़ता जंगल

राज्य में सड़कें, बिजली परियोजनाएं, पर्यटन और रियल एस्टेट के नाम पर जंगल लगातार काटे गए, लेकिन कभी यह नहीं सोचा गया कि वन्यजीव कहां जाएंगे। जंगल सिमटे, गलियारे टूटे और जानवर गांवों की ओर उतर आए। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का परिणाम है।

विडंबना यह है कि एक ओर सरकार पर्यावरण संरक्षण की बात करती है, तो दूसरी ओर वही सरकार जंगलों के बीच से विकास की लकीरें खींच देती है। जब गुलदार गांव में घुसता है, तो उसे ‘आदमखोर’ कह दिया जाता है, लेकिन उस व्यवस्था पर कोई सवाल नहीं उठता जिसने उसे वहां पहुंचने पर मजबूर किया।

प्रशासनिक तैयारी शून्य क्यों?

पौड़ी, चमोली, अल्मोड़ा और टिहरी जैसे जिले वर्षों से संवेदनशील श्रेणी में हैं। इसके बावजूद न तो स्थायी निगरानी तंत्र है, न ही प्रभावी चेतावनी प्रणाली। गांवों के आसपास झाड़ियों की सफाई, बफर ज़ोन, रात्रि गश्त और सामुदायिक प्रशिक्षण—ये सब योजनाएं फाइलों में कैद हैं।

हर बार हादसे के बाद प्रशासन ‘स्थिति नियंत्रण में’ होने का दावा करता है, लेकिन हकीकत यह है कि ग्रामीण खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। बच्चे घर के आंगन में भी सुरक्षित नहीं हैं।

वन विभाग बनाम जन सुरक्षा

वन्यजीव संरक्षण ज़रूरी है, लेकिन क्या उसकी कीमत मासूम जिंदगियों से चुकाई जाएगी? यह बहस अब भावनात्मक नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही की है। जब किसी क्षेत्र में लगातार हमले हो रहे हों, तो वहां विशेष कार्ययोजना क्यों नहीं बनती? क्यों हर मौत के बाद ग्रामीणों को सड़क पर उतरना पड़ता है?

राज्य सरकार को आईना

बरस्वार की घटना राज्य सरकार के लिए चेतावनी है। अगर आज भी मानव-वन्यजीव संघर्ष को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो पहाड़ों में डर स्थायी हो जाएगा और भरोसा टूट जाएगा। यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, बल्कि नीति बदलने और ज़मीन पर कार्रवाई का है।

जंगल और इंसान दोनों इस पहाड़ की पहचान हैं। अगर इनमें से एक को असुरक्षित छोड़ दिया गया, तो उत्तराखंड की आत्मा ही संकट में पड़ जाएगी।