उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना एक बार फिर अटक गई है। इस बार 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि के इस्तेमाल का प्रस्ताव पर्यावरणीय और प्रक्रियागत सवालों में उलझ गया। क्षेत्र में 123 पेड़ों को काटने की योजना थी, लेकिन रीजनल इंपावर्ड कमेटी ने केवल पेड़ों की संख्या के आधार पर फैसला नहीं किया। कमेटी की प्रमुख आपत्ति यह रही कि गैर-वन भूमि के वैकल्पिक स्थलों की पर्याप्त तलाश नहीं की गई।
यह मामला विकास बनाम पर्यावरण की सामान्य बहस से आगे जाता है। सवाल यह है कि जब किसी महत्वपूर्ण संस्थान को स्थानांतरित करने की योजना बनाई जाती है, तो क्या जमीन का चयन सभी संभावित विकल्पों की पड़ताल के बाद किया जाता है? यदि गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं है, तो उसका ठोस आधार प्रस्तुत करना भी योजना बनाने वाली एजेंसी की जिम्मेदारी है।
हाईकोर्ट की ओर से मौजूदा परिसर में जगह की कमी, बढ़ते मुकदमों और वादकारियों के रहने तथा यातायात संबंधी खर्चों को अहम समस्या बताया गया है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, वर्ष 2010 में मुकदमों की संख्या करीब चार हजार थी, जो अब बढ़कर लगभग 64 हजार बताई गई है। ऐसे में न्यायालय के लिए बेहतर आधारभूत ढांचे की जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। न्याय तक पहुंच केवल अदालत में सुनवाई होने से पूरी नहीं होती, बल्कि वहां पहुंचने का समय, खर्च और सुविधाएं भी महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन दूसरी ओर, वन भूमि के उपयोग का फैसला केवल निर्माण की जरूरत से नहीं किया जा सकता। प्रस्ताव में हाथी गलियारे की स्थिति के सत्यापन, विस्तृत लेआउट और अन्य दस्तावेजों से जुड़ी कमियां भी सामने आईं। इसका अर्थ है कि योजना को पर्यावरणीय और प्रशासनिक कसौटियों पर अधिक स्पष्टता के साथ प्रस्तुत करने की जरूरत है।
हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्र के लिए यह निर्णय भविष्य की दिशा तय करने वाला हो सकता है। हाईकोर्ट आने से संस्थागत गतिविधियां और स्थानीय आर्थिक अवसर बढ़ सकते हैं, लेकिन इसके साथ यातायात, आवास, पार्किंग और नागरिक सुविधाओं पर दबाव का आकलन भी जरूरी है। दूसरी ओर, वन क्षेत्र के इस्तेमाल से जुड़े प्रभावों को भी वैज्ञानिक आधार पर समझना होगा।
सरकार के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है। हाईकोर्ट के लिए उपयुक्त भूमि तलाशना और वन संरक्षण के नियमों का पालन करना। यदि गैर-वन भूमि के विकल्प उपलब्ध हैं, तो उनकी पहचान की जाए। यदि नहीं, तो प्रत्येक विकल्प की वास्तविक स्थिति और सीमाओं के प्रमाण सामने रखे जाएं। साथ ही, मौजूदा हाईकोर्ट परिसर की भविष्य की उपयोगिता और कानूनी स्थिति पर भी स्पष्ट निर्णय होना चाहिए।
हाईकोर्ट का स्थानांतरण केवल भवन बनाने की परियोजना नहीं, बल्कि न्याय की पहुंच और पर्यावरणीय जिम्मेदारी से जुड़ा निर्णय है। इसे जल्दबाजी या बार-बार अधूरे प्रस्तावों के सहारे आगे बढ़ाने के बजाय ऐसी योजना के साथ आगे ले जाना चाहिए, जिसमें न्यायिक जरूरत, पर्यावरण संरक्षण और सार्वजनिक हित तीनों का संतुलन हो।



