भारत एक अद्भुत देश है। यहां कई चीजें अचानक और एक साथ होती हैं। कभी प्याज के दाम बढ़ जाते हैं, कभी टमाटर गायब हो जाता है और कभी अचानक ऐसा लगता है जैसे पूरे देश के घरों में गैस सिलेंडर ने एक साथ दम तोड़ दिया हो।
पिछले कुछ दिनों से गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें यह बताने के लिए काफी हैं कि हमारे देश में गैस की आपूर्ति से ज्यादा मजबूत हमारी “लाइन में लगने की संस्कृति” है। ऐसा प्रतीत होता है मानो सिलेंडरों ने भी आपस में कोई गुप्त बैठक कर ली हो। “चलो भाई, इस बार सब एक साथ खत्म होते हैं, थोड़ा रोमांच तो होना चाहिए!”
दिलचस्प बात यह है कि आम दिनों में महीनों तक सिलेंडर चलता है, लेकिन जैसे ही कहीं से खबर उड़ती है कि “गैस की कमी हो सकती है”, वैसे ही पूरे मोहल्ले के चूल्हे तेजी से जलने लगते हैं और अचानक पता चलता है कि सबके घर का सिलेंडर लगभग एक ही समय में खाली हो गया है।
इसके बाद शुरू होता है भारतीय लोकतंत्र का सबसे जीवंत दृश्य गैस एजेंसी के बाहर लगी लंबी कतार। कोई टोकन पूछ रहा है, कोई बुकिंग नंबर, कोई यह बता रहा है कि “भाई साहब, मेरा तो कल से ही खत्म है।”
इन कतारों में खड़े लोग सिर्फ सिलेंडर का इंतजार नहीं करते, बल्कि देश की राजनीति, महंगाई, सरकार की नीतियों और पड़ोसी की रसोई तक का विश्लेषण कर डालते हैं। एक तरह से देखें तो गैस एजेंसी के बाहर की लाइनें हमारे देश की अनौपचारिक “जन संसद” बन जाती हैं।
सवाल यह भी है कि आखिर हर बार ऐसी स्थिति क्यों बनती है? क्या सचमुच गैस की कमी होती है, या फिर अफवाहों की गैस ज्यादा तेज़ी से फैलती है? कई बार लगता है कि सिलेंडर से ज्यादा दबाव हमारे धैर्य की परीक्षा पर होता है।
फिर भी भारतीय समाज की खासियत यही है कि थोड़ी परेशानी, थोड़ी अफवाह और थोड़ी व्यवस्था की कमी मिलकर एक ऐसा दृश्य बना देती है जिसमें व्यंग्य भी है और सच्चाई भी।
क्योंकि इस देश में सिर्फ गैस सिलेंडर ही नहीं, समस्याएं भी अक्सर “एक साथ” खत्म नहीं होतीं, वे लाइन लगाकर आती हैं।
गैस की लाइन, बयान की बारिश
देश के कई शहरों में इन दिनों गैस एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं। लोगों के घरों में मानो सिलेंडर ने सामूहिक रूप से फैसला कर लिया हो कि “अब एक साथ ही खत्म होंगे।” सुबह से ही लोग बुकिंग नंबर और टोकन लेकर लाइन में खड़े हैं, लेकिन असली राहत सिलेंडर से कम और नेताओं के बयानों से ज्यादा मिल रही है।
सबसे पहले सत्ता पक्ष के एक मंत्री ने बयान दिया,
“देश में गैस की कोई कमी नहीं है। यह सिर्फ अफवाह है। लोग अनावश्यक घबराकर ज्यादा बुकिंग कर रहे हैं।” इसके तुरंत बाद विपक्ष के एक नेता का बयान आया
“अगर गैस की कमी नहीं है तो फिर एजेंसियों के बाहर इतनी लंबी लाइनें क्यों हैं? सरकार को जनता को जवाब देना चाहिए।”
उधर स्थानीय स्तर पर भी बयानबाजी कम नहीं है। एक जनप्रतिनिधि ने कहा “आपूर्ति पूरी है, बस कुछ तकनीकी दिक्कतों के कारण थोड़ी देरी हो रही है।”
तकनीकी दिक्कत क्या है, यह कोई ठीक से नहीं बताता, लेकिन लाइन में लगे लोगों को इतना जरूर समझ आ जाता है कि दिक्कत तकनीकी से ज्यादा व्यवस्थागत है।
दिलचस्प बात यह है कि जैसे ही गैस की कमी की खबर फैलती है, पूरे मोहल्ले में एक साथ सिलेंडर खत्म होने लगते हैं। जो सिलेंडर कल तक आधा भरा था, वह अचानक खाली घोषित हो जाता है। शायद सिलेंडर भी सोचता होगा कि “जब सब खत्म हो रहे हैं तो मैं क्यों पीछे रहूं।”
गैस एजेंसी के बाहर लगी लाइनें धीरे-धीरे चर्चा का मंच बन जाती हैं। कोई महंगाई पर चर्चा कर रहा है, कोई सरकार को कोस रहा है और कोई यह बता रहा है कि “मेरे घर में तो कल से चूल्हा नहीं जला।”
इस पूरे घटनाक्रम में एक चीज बिल्कुल साफ है कि सिलेंडर चाहे देर से आए, लेकिन बयान समय पर पहुंच जाते हैं।
नेता आश्वासन दे देते हैं, अधिकारी स्पष्टीकरण दे देते हैं और जनता लाइन में खड़ी होकर इंतजार करती रहती है। आखिर में सवाल वही रह जाता है। देश में गैस ज्यादा है या बयान? क्योंकि अक्सर ऐसा लगता है कि सिलेंडर की सप्लाई सीमित है, लेकिन बयान की सप्लाई असीमित।

