देहरादून। माता-पिता अपनी संतान के बेहतर भविष्य के लिए जीवनभर संघर्ष करते हैं, लेकिन जब वही संतान बुढ़ापे में उनका सहारा बनने के बजाय उन्हें असहाय छोड़ दे, तो यह रिश्तों के बदलते स्वरूप की दर्दनाक तस्वीर बन जाती है। ऐसा ही एक मामला दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में सामने आया, जहां एक बेटा अपने घायल पिता को इलाज के लिए अस्पताल लाया, लेकिन भर्ती की बात सुनते ही उन्हें स्ट्रेचर पर छोड़कर चला गया।
गढ़ी कैंट क्षेत्र के टपकेश्वर निवासी 71 वर्षीय सुरेश त्यागी छह दिन पहले काम पर जाते समय एक स्कूटी की टक्कर से घायल हो गए थे। घरों में पुताई कर परिवार का भरण-पोषण करने वाले सुरेश त्यागी के दाएं पैर में चोट लगने के बाद लगातार दर्द बना रहा। उन्होंने पहले घर पर आराम कर दर्द ठीक होने की उम्मीद की, लेकिन स्थिति में सुधार नहीं होने पर उन्होंने बेटे से अस्पताल ले जाने को कहा।
शुक्रवार सुबह उनका बेटा एक दोस्त के साथ उन्हें दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल लेकर पहुंचा। ऑर्थोपेडिक विभाग के चिकित्सकों ने जांच के बाद पैर में गंभीर चोट अथवा फ्रैक्चर की आशंका जताते हुए एक्स-रे और अन्य जांच कराने की सलाह दी। जांच और एक्स-रे कराने के बाद करीब 935 रुपये का बिल जमा किया गया। बताया गया कि बेटे ने यह रकम अपने दोस्त से उधार लेकर जमा की थी।
जांच पूरी होने के बाद बेटे ने अस्पताल में ही पिता से उधार लिए गए रुपये लौटाने की मांग की। आर्थिक तंगी और इलाज की स्थिति का हवाला देते हुए बुजुर्ग ने तत्काल पैसे देने में असमर्थता जताई। आरोप है कि इसके बाद बेटा उन्हें स्ट्रेचर पर छोड़कर अस्पताल से चला गया।
बेटे के लौटने की उम्मीद में सुरेश त्यागी करीब तीन घंटे तक अस्पताल के स्ट्रेचर पर दर्द से कराहते रहे। काफी देर तक उन्हें अकेला देखकर अस्पताल के सुरक्षा कर्मियों ने उनकी जानकारी ली और उनके मोबाइल फोन के माध्यम से पत्नी से संपर्क कराया।
सुरेश त्यागी की पत्नी एक स्कूल में सुरक्षा गार्ड के रूप में कार्यरत हैं और उन्हें लगभग चार हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है। सूचना मिलने पर उन्होंने किसी तरह स्कूल से छुट्टी ली और अस्पताल पहुंचीं। इसके बाद बुजुर्ग की देखभाल और इलाज की व्यवस्था की गई।
यह घटना न केवल एक बुजुर्ग की पीड़ा को सामने लाती है, बल्कि समाज में पारिवारिक जिम्मेदारियों और मानवीय संवेदनाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। जिस पिता ने पूरी उम्र बेटे के पालन-पोषण और भविष्य संवारने में लगा दी, उसे जीवन के अंतिम पड़ाव में अस्पताल के स्ट्रेचर पर अकेला छोड़ दिया जाना हर किसी को सोचने पर मजबूर करता है।

