उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व का पर्याय रहे आजम खान आज पहले जैसी सक्रियता में नहीं हैं। कानूनी मामलों और बदले राजनीतिक हालात ने उनकी भूमिका को सीमित कर दिया है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के सामने बड़ा प्रश्न खड़ा है क्या पार्टी एक नए मुस्लिम चेहरे की तलाश में है, या यह केवल परिस्थितिजन्य रणनीति है?
इसी परिप्रेक्ष्य में पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्धीकी का सपा में शामिल होना महज़ दल-बदल नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक संकेत देता है। बसपा से निष्कासन, कांग्रेस में लंबा प्रवास और अब सपा की पारी—यह यात्रा बताती है कि सिद्धीकी अपनी सियासी जमीन फिर से मजबूत करना चाहते हैं। वहीं सपा के लिए यह कदम मुस्लिम नेतृत्व की कमी के आरोपों को संतुलित करने का प्रयास भी हो सकता है।
करिश्मा बनाम समीकरण
आज़म खान केवल एक संगठनात्मक नेता नहीं रहे, बल्कि सपा की विचारधारा के मुखर प्रवक्ता रहे हैं। मुलायम सिंह यादव के दौर से लेकर अखिलेश यादव के नेतृत्व तक उनकी पकड़ मजबूत रही। उनकी भाषण शैली, तेवर और जनस्वीकार्यता ने उन्हें एक अलग ऊंचाई दी।
इसके विपरीत, नसीमुद्दीन सिद्धीकी का कद सत्ता-प्रशासन और संगठन के अनुभव से जुड़ा है, लेकिन जन-आंदोलन की राजनीति में उनकी छवि उतनी प्रभावशाली नहीं रही। ऐसे में उन्हें आज़म का “प्रतिस्थापन” कहना सियासी सरलता हो सकती है, यथार्थ नहीं।
मुस्लिम वोटों की नई जंग
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मुस्लिम राजनीति में असामान्य हलचल है। असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता, मायावती की कोशिशें, कांग्रेस की कवायद और भाजपा का पसमांदा कार्ड—ये सभी संकेत देते हैं कि मुस्लिम मतदाताओं को लेकर बहुकोणीय मुकाबला बनने जा रहा है।
समाजवादी पार्टी जानती है कि 18–20 प्रतिशत मुस्लिम वोटों में जरा-सी भी दरार उसके चुनावी समीकरण को बिगाड़ सकती है। इसलिए नसीमुद्दीन की एंट्री को एक “संदेश” की तरह भी देखा जा सकता है कि पार्टी मुस्लिम नेतृत्व को लेकर खाली नहीं है।
प्रयोग सफल होगा या नहीं?
राजनीति केवल चेहरों से नहीं, विश्वास से चलती है। बार-बार दल बदलने की छवि नसीमुद्दीन के लिए चुनौती बन सकती है। वहीं सपा के लिए यह जोखिम है कि कहीं यह कदम पुराने समर्थकों में भ्रम न पैदा कर दे।
अंततः सवाल केवल यह नहीं कि क्या नसीमुद्दीन सिद्धीकी आज़म खान का विकल्प बन पाएंगे; असली प्रश्न यह है कि क्या सपा मुस्लिम समाज के भरोसे को उसी मजबूती से बनाए रख पाएगी, जैसा वह अतीत में करती रही है। आने वाला चुनाव इस सियासी प्रयोग की असली परीक्षा होगा।

