मध्य पूर्व में जारी युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर लगातार हमले किए जा रहे हैं, जबकि ईरान भी जवाबी कार्रवाई में खाड़ी देशों को निशाना बना रहा है। इस बढ़ते तनाव के बीच तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं।
इसी बीच सऊदी अरब ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने या तेल आपूर्ति को बाधित करने की कोशिश की गई, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान खुद ईरान को ही उठाना पड़ेगा। सऊदी अधिकारियों ने साफ किया कि खाड़ी क्षेत्र में समुद्री मार्गों और तेल आपूर्ति की सुरक्षा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।
दरअसल, पिछले एक हफ्ते से मध्य पूर्व में संघर्ष तेज हो गया है। अमेरिका और इजरायल ने 7 मार्च की रात ईरान की ऊर्जा व्यवस्था पर बड़ा हमला किया। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी के अनुसार दक्षिण तेहरान और उत्तर-पश्चिम इलाके में स्थित शहरान तेल डिपो को निशाना बनाया गया। हमले के बाद तेहरान के आसमान में आग की लपटें और धुएं का गुबार दूर-दूर तक देखा गया।
इजरायली सेना ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए दावा किया कि यह हमला उन ऊर्जा भंडारों पर किया गया जिनका इस्तेमाल ईरानी सेना कर रही थी। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा था कि ईरान के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा हमला किया जाएगा।
दूसरी ओर ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने बहरीन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, यूएई और जॉर्डन पर मिसाइल और ड्रोन से हमले किए। हालांकि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा है कि ईरान किसी पड़ोसी देश पर हमला नहीं करेगा, जब तक कि ईरान पर होने वाला हमला उसी देश की जमीन से न किया जाए।
बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में उछाल देखने को मिल रहा है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष और बढ़ता है तो तेल की कीमतें इससे भी ऊपर जा सकती हैं।
इसका असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बन सकती है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
फिलहाल दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में यह संघर्ष किस दिशा में जाता है। यदि कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं तो हालात सामान्य हो सकते हैं, लेकिन जंग लंबी खिंचने पर वैश्विक ऊर्जा संकट और गहरा सकता है।

