चम्पावत। जिले से निकली यह तस्वीर व्यवस्था की दुर्दशा को उजागर करती है। 65 वर्षीय रुईयां निवासी संतोष सिंह का पूरा जीवन सड़क का इंतजार करते-करते बीत गया। जब मृत्यु आई, तो उनकी लाश को तिरपाल में लपेटकर मात्र एक डंडे के सहारे 12 किलोमीटर दूर घाट तक ले जाना पड़ा।
मानसून के दौरान प्राकृतिक आपदा का दर्द झेल रहे इस क्षेत्र के लिए यह कोई अनोखी घटना नहीं है। दशकों से सड़क और बुनियादी सुविधाओं से वंचित गांवों के लोग ऐसी त्रासदियों के गवाह बने हैं। नेताओं के वादों और सिस्टम की अनदेखी का खामियाजा ग्रामीणों को हमेशा भुगतना पड़ता है।
विडंबना यह है कि चुनाव के समय इन्हीं मतदाताओं को डोली में बिठाकर मतदान केंद्र तक पहुंचाने वाले नेता अब कहीं दिखाई नहीं देते। क्या वे इस तस्वीर को देखेंगे? क्या उनके मन में कोई शर्म उठेगी?
यह सिर्फ संतोष सिंह की अर्थी नहीं, बल्कि उन व्यवस्थाओं की भी शवयात्रा है, जिसने आधुनिक युग में भी गांवों को सड़क जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित रखा। सवाल यही है, क्या अब भी बदलाव होगा, या आने वाले समय में और कितनी लाशें डंडे पर लटककर घाट तक जाएंगी?

