हल्द्वानी। उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर राज्य की राजनीति और शासन-प्रशासन के केंद्र में आ गया है। सरकार ने पौड़ी के श्रीकोट स्थित राजकीय नर्सिंग कॉलेज डोभ का नाम बदलकर ‘स्वर्गीय अंकिता भंडारी राजकीय नर्सिंग कॉलेज’ करने का निर्णय लिया है। यह कदम एक ओर जहां पीड़िता की स्मृति को सम्मान देने की पहल के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह फैसला कई सवाल भी खड़े करता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर लिया गया यह निर्णय ऐसे समय में सामने आया है, जब पूरे प्रदेश में सीबीआई जांच की मांग तेज हो रही है। अंकिता के माता-पिता की मांग पर सरकार ने सीबीआई जांच को लेकर विधिक परीक्षण शुरू करने की बात कही है। यह आश्वासन महत्वपूर्ण है, लेकिन जनता और पीड़ित परिवार की अपेक्षा केवल आश्वासनों से आगे बढ़कर ठोस और पारदर्शी कार्रवाई की है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड केवल एक अपराध नहीं था, बल्कि उसने सत्ता, प्रभाव और सिस्टम की कमजोरियों को उजागर किया था। यही कारण है कि इस मामले में समय बीतने के बावजूद जनभावनाएं शांत नहीं हुई हैं। दोषियों को सजा मिल चुकी है, फिर भी वीआईपी भूमिका और जांच की निष्पक्षता को लेकर उठते सवाल आज भी समाज के भीतर जीवित हैं।
नर्सिंग कॉलेज का नामकरण सरकार की संवेदनशीलता को दर्शाता है, लेकिन यह भी सच है कि प्रतीकात्मक निर्णय न्याय का विकल्प नहीं हो सकते। विपक्ष इसे सरकार का “मास्टर स्ट्रोक” बता रहा है, जबकि सत्तापक्ष इसे पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने का प्रमाण मानता है। वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं है, जहां संवेदना और सियासत की रेखाएं आपस में उलझती नजर आती हैं।
मुख्यमंत्री का यह कहना कि अंकिता के नाम पर राजनीति करने वालों को जनता से माफी मांगनी चाहिए, अपने आप में एक कड़ा संदेश है। लेकिन यह संदेश तभी प्रभावी होगा, जब सरकार जांच और न्याय की प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता और तत्परता दिखाए।
अंकिता भंडारी का नाम अब एक शिक्षण संस्थान से जुड़ गया है। यह आने वाली पीढ़ियों को उसके साथ हुए अन्याय की याद दिलाएगा। सवाल यह है कि क्या यह याद केवल एक नाम तक सीमित रहेगी या यह व्यवस्था को और मजबूत, जवाबदेह और संवेदनशील बनाने की दिशा में भी प्रेरित करेगी। अंकिता के मामले में यही सबसे बड़ा और सबसे जरूरी उत्तर है।

