हल्द्वानी। पाकिस्तान के मुरीदके में ईद के दिन जो हुआ, उसने आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के भीतर सुलग रही दरारों को बेनकाब कर दिया। नमाज के बाद का सन्नाटा अचानक गोलियों और चीखों से टूट गया, जब संगठन के ही कमांडर बिलाल आरिफ सलाफी को उसके अपने साथियों ने मौत के घाट उतार दिया।
ईद की नमाज खत्म कर जैसे ही बिलाल मरकज तैयबा परिसर से बाहर निकला, पहले से घात लगाए बैठे गाजी उबैदुल्लाह खान और उसकी पत्नी ने उस पर हमला बोल दिया। उबैदुल्लाह ने नजदीक से तीन गोलियां दागीं, जबकि उसकी पत्नी ने चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किए। कुछ ही पलों में बिलाल जमीन पर गिर पड़ा—और वहीं उसकी कहानी खत्म हो गई। घटना के बाद दोनों आरोपी भाग नहीं सके और शेखपुरा पुलिस के हत्थे चढ़ गए।
लेकिन यह हत्या कोई अचानक भड़का गुस्सा नहीं थी, बल्कि सालों से पल रहे बदले का अंजाम थी। करीब 3-4 साल पहले बिलाल ने उबैदुल्लाह के दामाद की हत्या कर दी थी। उस वक्त मामला दबा दिया गया, क्योंकि बिलाल आतंकी सरगना जकी उर रहमान लखवी का करीबी माना जाता था। कानून से बच निकलने की यही कहानी उबैदुल्लाह और उसकी पत्नी के भीतर बदले की आग बनकर जलती रही—और ईद के दिन उसे मौका मिल गया।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि हत्यारे और शिकार, दोनों एक ही कॉलोनी में रहते थे। लश्कर द्वारा बनाई गई तैयबा कॉलोनी, जहां जफर इकबाल जैसे बड़े नाम भी रहते हैं, वही इस खून की कहानी की पृष्ठभूमि बनी। एक ही संगठन, एक ही ठिकाना—लेकिन भीतर गहरी दुश्मनी।
शेखपुरा पुलिस ने दोनों आरोपियों के खिलाफ हत्या और कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की धाराओं में मामला दर्ज कर लिया है और पूछताछ जारी है। शुरुआती जांच में यह साफ हो गया है कि यह व्यक्तिगत रंजिश का मामला है, लेकिन इसके तार संगठन के अंदरूनी समीकरणों से भी जुड़े हैं।
गाजी उबैदुल्लाह खान कोई साधारण नाम नहीं है। वह 1993 से 2003 तक जम्मू-कश्मीर में सक्रिय रहा और बाद में पाकिस्तान लौटकर मुरीदके में आतंकियों को ट्रेनिंग देने लगा। वहीं बिलाल आरिफ सलाफी 2005 से संगठन से जुड़ा था और शेखपुरा में वित्त विभाग का प्रमुख था, जो हर साल लाखों रुपये जुटाने का काम करता था।
हत्या के बाद मरकज तैयबा परिसर में ही नमाज-ए-जनाजा अदा की गई और बिलाल को उसी कब्रिस्तान में दफनाया गया। लेकिन उसके साथ ही दफन हो गई उस संगठन की एक और परत, जो बाहर से जितना मजबूत दिखता है, अंदर से उतना ही बिखरता नजर आ रहा है।
यह वारदात सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि लश्कर-ए-तैयबा के भीतर पनप रही उस खामोश जंग का खुला ऐलान है, जहां दुश्मन अब बाहर नहीं, अपने ही बनते जा रहे हैं।

