ग़ज़ा, शांति और डॉलर:  ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ या वैश्विक सत्ता की नई बिसात?

Spread the love

हल्द्वानी। ग़ज़ा की तबाही, मध्य पूर्व की अस्थिरता और वैश्विक कूटनीति के बीच अमेरिका ने शांति की एक नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश की है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ न सिर्फ़ ग़ज़ा के भविष्य को दिशा देने का दावा करता है, बल्कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती देने का संकेत भी देता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बोर्ड में शामिल होने का न्योता इसी बड़े भू-राजनीतिक संकेत का हिस्सा है।

पहली नज़र में यह पहल मानवीय और सकारात्मक लगती है, ग़ज़ा में स्थायी शांति, पुनर्निर्माण और प्रशासनिक स्थिरता का वादा। लेकिन जैसे-जैसे परतें खुलती हैं, सवाल गहरे होते जाते हैं। क्या शांति किसी बोर्ड की सदस्यता से खरीदी जा सकती है? और अगर हां, तो क्या एक अरब डॉलर की कीमत पर?

‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ की संरचना बताती है कि यह केवल सलाहकार मंच नहीं, बल्कि एक ऐसा शक्तिशाली निकाय है जिसकी अध्यक्षता खुद अमेरिकी राष्ट्रपति करेंगे। स्थायी सदस्य बनने के लिए भारी आर्थिक योगदान की शर्त इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विकल्प के रूप में देखने की वजह देती है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, बोर्ड के चार्टर में ग़ज़ा का नाम तक शामिल नहीं होना, इसके इरादों पर सवाल खड़े करता है।

भारत के लिए यह न्योता कूटनीतिक रूप से अहम है। भारत लंबे समय से फिलिस्तीन मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाता आया है। एक ओर इसराइल से रणनीतिक संबंध, तो दूसरी ओर फिलिस्तीनी अधिकारों का समर्थन। ऐसे में ट्रंप के इस मंच से जुड़ना भारत को वैश्विक शांति प्रयासों के केंद्र में ला सकता है, लेकिन साथ ही उसे राजनीतिक और नैतिक जटिलताओं में भी डाल सकता है।

बोर्ड की सदस्यता सूची भी विवादों से खाली नहीं है। इराक युद्ध के फैसले के कारण आलोचना झेल चुके टोनी ब्लेयर की मौजूदगी, ग़ज़ा के पूर्ण विसैन्यीकरण की सख़्त शर्तें और फिलिस्तीनी प्रतिनिधित्व की कमी ये सब संकेत देते हैं कि यह मंच शांति से ज़्यादा नियंत्रण की भाषा बोलता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या शांति ऊपर से थोपी जा सकती है, या वह ज़मीनी सहमति से ही जन्म लेती है? ग़ज़ा के भविष्य का फैसला अगर बिना ग़ज़ा की आवाज़ के होगा, तो वह शांति नहीं, बल्कि एक और अस्थायी समझौता साबित हो सकता है।

भारत के सामने अब फैसला आसान नहीं है। न्योता स्वीकार करना वैश्विक भूमिका को मजबूत कर सकता है, लेकिन बिना स्पष्ट शर्तों और पारदर्शिता के यह कदम जोखिम भरा भी हो सकता है। शांति का रास्ता डॉलर से नहीं, संवाद, भरोसे और न्याय से निकलता है। यह बात दुनिया को एक बार फिर याद रखने की ज़रूरत है।

‘बोर्ड ऑफ़ पीस’ वाकई शांति का मंच बनेगा या वैश्विक शक्ति संतुलन का नया औज़ार। इसका जवाब आने वाला समय देगा।