हल्द्वानी। उत्सव, आस्था और उल्लास का प्रतीक गणेश चतुर्थी 27 अगस्त को को पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाएगी। बुधवार को हरतालिका तीज के अवसर पर श्रद्धालुओं ने गणपति बप्पा को घरों और पंडालों में स्थापित कर विधिवत पूजा शुरू कर दी है। इस दिन मूर्ति खरीदकर उसे घर लाना अत्यंत शुभ माना गया है।
गणेश चतुर्थी पर्व पर बाजारों में काफी चहल पहल रही। भक्तों ने गजानंद की मूर्तियों की खरीददारी की। बाजार में ₹300 से लेकर ₹18000 तक की मूर्तियां बिकी। गणेश चतुर्थी पर मूर्ति स्थापना से पूर्व गणपति की खरीदारी का भी विशेष महत्व होता है।
भगवान गणेश के जन्म से जुड़ी दो प्रमुख कथाएँ प्रचलित हैं
1. माता पार्वती की कथा: एक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने स्नान के समय अपने उबटन से एक बालक की आकृति बनाकर उसमें प्राण डाले और उसे अपने कक्ष की रक्षा में नियुक्त किया। जब भगवान शिव लौटे और उस बालक ने उन्हें अंदर जाने से रोका, तो शिवजी ने क्रोधित होकर उसका सिर काट दिया। माता पार्वती के शोक से व्यथित होकर शिवजी ने गणेश को हाथी का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया।
2. देवताओं की प्रार्थना से जन्म: दूसरी कथा के अनुसार, देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और माता पार्वती ने राक्षसों का सामना करने और शुभ कार्यों में सहयोग हेतु गणेश जी की रचना की।
पर्व की शुरुआत और परंपराएँ
गणेश चतुर्थी का पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से आरंभ होता है और अनंत चतुर्दशी तक मनाया जाता है। इन दस दिनों तक गणेश प्रतिमाएँ घरों और पंडालों में स्थापित की जाती हैं। मूर्ति स्थापना के समय ‘प्राण प्रतिष्ठा’ की जाती है, जिसमें भगवान की शक्ति को प्रतिमा में स्थापित किया जाता है। इसके पश्चात ‘षोडशोपचार पूजा’ और अंत में ‘उत्तरपूजा’ होती है। दसवें दिन यानी अनंत चतुर्दशी को गणेश विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों, गीतों और नारों के साथ बप्पा को विदा करते हैं।
भोजन और प्रसाद: मोदक का महत्व
गणेश चतुर्थी का नाम आते ही सबसे पहले मोदक की याद आती है। यह मिठाई गणेश जी का प्रिय भोग मानी जाती है। चावल या आटे से बनी यह मिठाई अंदर से गुड़, नारियल और सूखे मेवों से भरी होती है। परंपरा के अनुसार, गणपति को इक्कीस मोदक अर्पित किए जाते हैं। इन दिनों में घरों में कई प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं, पर मोदक का स्थान सबसे विशेष होता है।
इतिहास और सामाजिक महत्व
गणेश चतुर्थी का पर्व प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है। मराठा शासक शिवाजी ने इसे राज्य स्तरीय महत्व दिया, लेकिन इसे सामाजिक आंदोलन का रूप लोकमान्य तिलक ने दिया। उन्होंने इस पर्व को निजी आयोजन से सार्वजनिक आयोजन में बदला, जिससे यह समाजिक एकता और सांस्कृतिक जागरूकता का प्रतीक बन गया।


