ईरान की सत्ता के महलों में खौफ, खामेनेई बनाम ट्रंप और डगमाता इस्लामिक गणराज

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नई दिल्ली। ईरान एक बार फिर इतिहास के उस निर्णायक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां जनता का आक्रोश और सत्ता की कठोरता आमने-सामने टकरा रही है। महंगाई, बेरोजगारी, गिरती मुद्रा और आर्थिक बदहाली ने आम ईरानी की कमर तोड़ दी है। यही वजह है कि सड़कों पर उतरी भीड़ अब केवल आर्थिक राहत की मांग नहीं कर रही, बल्कि सीधे सत्ता संरचना को चुनौती देती नजर आ रही है। ‘तानाशाह मुर्दाबाद’ जैसे नारे यह साफ संकेत देते हैं कि असंतोष अब भय की सीमा लांघ चुका है।

इन प्रदर्शनों पर ईरानी सत्ता की प्रतिक्रिया और भी भयावह तस्वीर पेश करती है। इंटरनेट शटडाउन, हजारों गिरफ्तारियां और सुरक्षा बलों द्वारा सीधी गोलीबारी—ये सब एक ऐसे शासन की झलक देते हैं जो संवाद के बजाय दमन को ही समाधान मान रहा है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, सिर्फ छह अस्पतालों में ही गोली लगने से कम से कम 217 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है। यह आंकड़ा किसी युद्ध का नहीं, बल्कि अपने ही नागरिकों पर की गई कार्रवाई का है। इससे पहले मानवाधिकार संगठनों ने 62 मौतों की पुष्टि की थी, लेकिन जमीनी सच्चाई उससे कहीं अधिक भयावह प्रतीत होती है। मरने वालों में बच्चों के शामिल होने की खबरें इस संकट को और भी अमानवीय बना देती हैं।

सरकारी मीडिया लगातार प्रदर्शनकारियों को ‘आतंकी’ और ‘तोड़फोड़ करने वाला’ करार देकर कार्रवाई को वैध ठहराने की कोशिश कर रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि ये लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी बचाने के लिए सड़कों पर उतरे हैं। इतिहास गवाह है कि जब सत्ता अपने ही नागरिकों को दुश्मन मान लेती है, तब उसका पतन दूर नहीं होता।

स्थिति को और खतरनाक बना दिया है अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के बीच तेज होती जुबानी जंग ने। खामेनेई का यह कहना कि “ट्रंप के हाथ ईरानियों के खून से सने हैं” और ट्रंप की धमकी कि “ईरान को वहीं चोट दी जाएगी, जहां सबसे ज्यादा दर्द होगा”—यह संकेत देता है कि ईरान का आंतरिक जनविद्रोह अब अंतरराष्ट्रीय टकराव की चपेट में आता जा रहा है। ऐसे में ईरानी जनता दो पाटों के बीच पिसती नजर आती है।

1979 की इस्लामिक क्रांति का हवाला देकर सत्ता यह जताने की कोशिश कर रही है कि वह खून देकर बनी है और खून से ही बचेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या वही क्रांति, जो कभी जनता के नाम पर लड़ी गई थी, आज उसी जनता की 217 लाशों के सहारे अपनी वैधता बनाए रख सकती है? शाह के पतन का उदाहरण देकर दी जा रही चेतावनियां दरअसल सत्ता के भीतर गहराते भय को ही उजागर करती हैं।

भारत समेत पूरी दुनिया के लिए यह संकट केवल ईरान का आंतरिक मामला नहीं है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता का असर वैश्विक तेल बाजार, सुरक्षा समीकरणों और प्रवासी नागरिकों पर पड़ना तय है। भारत की सतर्कता और अपने नागरिकों की सुरक्षा पर नजर रखना इस बदलते हालात में बेहद जरूरी है।

अंततः ईरान के सामने विकल्प साफ हैं—या तो वह गोलियों और इंटरनेट बंदी के जरिए असंतोष को कुचलने की कोशिश करे, या फिर जनता की आवाज़ सुनकर सुधारों की राह चुने। इतिहास बार-बार यही बताता है कि गोलियों से दबाई गई आवाज़ें शांत नहीं होतीं, वे समय आने पर और भी प्रचंड रूप में लौटती हैं। ईरान की सड़कों पर बहता खून केवल विरोध नहीं, बल्कि आने वाले बड़े बदलाव की चेतावनी है।