पश्चिम बंगाल की राजनीति केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीकों, भावनात्मक अपील और पहचान की राजनीति का भी अखाड़ा रही है। 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह अपने पारंपरिक नारे ‘जय श्री राम’ के साथ ‘जय मां काली’ और ‘जय मां दुर्गा’ को प्रमुखता देना शुरू किया है, उसे महज धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि एक सुविचारित राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा बंगाल के मतदाताओं के नाम लिखे संदेश में ‘जय मां काली’ का उल्लेख इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है। बंगाल में शक्ति उपासना की गहरी परंपरा है। दुर्गापूजा यहां केवल त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का केंद्र है। ऐसे में भाजपा का यह कदम स्थानीय भावनाओं से सीधा जुड़ने की कोशिश प्रतीत होता है।
अब तक बंगाल में बीजेपी की राजनीति ‘जय श्री राम’ के इर्द-गिर्द घूमती रही, जिसने उसे 2019 के लोकसभा चुनाव में उल्लेखनीय बढ़त दिलाई थी। परंतु 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी सत्ता तक नहीं पहुंच सकी। उस अनुभव के बाद पार्टी ने यह समझा कि बंगाल की सांस्कृतिक अस्मिता को समझे बिना यहां स्थायी राजनीतिक आधार बनाना कठिन है। ‘जय मां काली’ का उद्घोष उसी दिशा में एक नया प्रयोग है।
घुसपैठ, महिला सुरक्षा और सांस्कृतिक विमर्श
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में कथित बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा फिर उठाया। बीजेपी लंबे समय से इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसंख्या संतुलन से जोड़कर पेश करती रही है। पार्टी का मानना है कि सीमावर्ती जिलों में यह बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है।
दूसरी ओर महिला सुरक्षा को भी प्रमुखता दी जा रही है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कोलकाता में महिला मोर्चा की बैठक में दुर्गा शक्ति का उल्लेख करते हुए महिलाओं से आत्मबल जगाने की अपील की। केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी और विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने भी मां दुर्गा और मां तारा के जयकारे के साथ सांस्कृतिक प्रतीकों को आगे बढ़ाया। स्पष्ट है कि बीजेपी ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘नारी शक्ति’ को एक साथ साधने की कोशिश में है।
टीएमसी का लंबा शासन और एंटी-इंकम्बेंसी
पश्चिम बंगाल में 2011 से ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। वाम मोर्चे के 33 साल के शासन को समाप्त कर सत्ता में आईं ममता बनर्जी मई 2026 में बतौर मुख्यमंत्री 15 वर्ष पूरे करेंगी। यह लंबा कार्यकाल स्वाभाविक रूप से एंटी-इंकम्बेंसी को जन्म देता है, जिसे बीजेपी भुनाना चाहती है।
हालांकि टीएमसी ने भी अपनी राजनीति को बंगाली अस्मिता, सामाजिक योजनाओं और अल्पसंख्यक समर्थन के आधार पर मजबूत किया है। ऐसे में बीजेपी की चुनौती केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक भावनात्मक कथा गढ़ने की भी है।
रणनीति या जोखिम…?
‘जय मां काली’ का नारा बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा को संबोधित करता है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़े हैं। यदि यह कदम केवल चुनावी प्रतीकवाद तक सीमित रह गया, तो मतदाता इसे अवसरवाद के रूप में देख सकते हैं। वहीं यदि पार्टी इसे स्थानीय नेतृत्व, जमीनी संगठन और ठोस नीतिगत एजेंडे से जोड़ने में सफल रहती है, तो यह बड़ा राजनीतिक लाभ भी दे सकता है।
बीजेपी की राज्य इकाई की कमान समिक भट्टाचार्य के हाथों में है, और ‘मिशन बंगाल’ को नई ऊर्जा देने की कोशिश जारी है। सवाल यह है कि क्या सांस्कृतिक प्रतीकों का यह नया प्रयोग 2026 में सत्ता का सेतु बन पाएगा, या फिर बंगाल की राजनीति एक बार फिर अपनी अलग राह चुनेगी?
बंगाल का मतदाता भावनात्मक भी है और राजनीतिक रूप से सजग भी। ‘जय श्री राम’ से ‘जय मां काली’ तक की यह यात्रा केवल नारे की नहीं, बल्कि रणनीति, पहचान और सत्ता के समीकरण की यात्रा है। 2026 का चुनाव बताएगा कि यह सांस्कृतिक दांव शह साबित होता है या मात।

