उत्तराखंड की राजनीति में शुक्रवार को बड़ा घटनाक्रम हुआ, जब पुष्कर सिंह धामी ने अपनी कैबिनेट का विस्तार करते हुए पांच नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया। पहली नजर में यह कदम आगामी उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी का हिस्सा लगता है, लेकिन इसके भीतर क्षेत्रीय संतुलन, संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक संदेश की कई परतें छिपी हैं।
सबसे बड़ा सवाल कुमाऊं, खासकर सीमांत पिथौरागढ़ और बागेश्वर को लेकर खड़ा हुआ है। उत्तराखंड गठन के बाद शायद यह पहला मौका है जब भाजपा सरकार में इन जिलों को कैबिनेट स्तर पर प्रतिनिधित्व नहीं मिला। यह केवल राजनीतिक असंतुलन नहीं, बल्कि भावनात्मक नाराज़गी का कारण भी बन सकता है।
पिथौरागढ़ में बिशन सिंह चुफाल और फकीर राम टम्टा जैसे अनुभवी नेताओं के नाम चर्चा में थे। वहीं बागेश्वर में सुरेश गड़िया को लेकर उम्मीदें थीं, खासकर चंदन राम दास के निधन के बाद। लेकिन अंतिम सूची में इनका नाम न होना यह दिखाता है कि पार्टी ने स्थानीय अपेक्षाओं से ज्यादा व्यापक चुनावी गणित को प्राथमिकता दी।
हालांकि, कैबिनेट में शामिल किए गए चेहरे—खजान दास, राम सिंह कैड़ा, प्रदीप बत्रा, मदन कौशिक और भरत चौधरी—अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखते हैं। यह साफ संकेत है कि पार्टी ने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश की है।
लेकिन इस पूरे विस्तार का सबसे अहम पहलू उसका समय है। चुनाव में अब लगभग 9 महीने ही बचे हैं। ऐसे में इन नए मंत्रियों के पास काम करने के लिए सीमित समय है। जैसे ही चुनाव नजदीक आएंगे, प्रदेश में आचार संहिता लागू हो जाएगी, जिसके बाद नई योजनाओं और बड़े फैसलों पर रोक लग जाती है।
यही वजह है कि यह सवाल जोर पकड़ रहा है। क्या ये मंत्री “विकास के वास्तुकार” बन पाएंगे या सिर्फ “चुनावी प्रबंधक” बनकर रह जाएंगे?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो यह कैबिनेट विस्तार “गवर्नेंस” से ज्यादा “इलेक्शन मैनेजमेंट” की रणनीति का हिस्सा नजर आता है। 9 महीने की सक्रियता और उसके बाद आचार संहिता। इस पूरे समीकरण में मंत्रियों की भूमिका जमीनी काम से ज्यादा जनसंपर्क, संदेश और चुनावी माहौल बनाने तक सीमित हो सकती है।
दूसरी ओर, गुटबाजी का खतरा भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिन नेताओं के नाम अंतिम समय में कटे हैं, उनके समर्थकों में असंतोष बढ़ सकता है, जो चुनावी समय में पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है।
यह कैबिनेट विस्तार केवल सत्ता का विस्तार नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा ज्यादा नजर आता है। 9 महीने की यह “सीमित सत्ता” और उसके बाद आचार संहिता का ब्रेक। यह संकेत देता है कि असली परीक्षा अब विकास नहीं, बल्कि चुनावी प्रदर्शन की होगी।
अगर सीमांत की नाराज़गी और संगठन के भीतर संतुलन नहीं साधा गया, तो यह शतरंज की चाल आगे चलकर उलटी भी पड़ सकती है।

