देहरादून। विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ और बदरीनाथ धाम एक बार फिर विवादों के केंद्र में हैं। इस बार मामला श्रद्धालुओं की आस्था और मंदिर में चढ़ाए गए दान की राशि के इस्तेमाल से जुड़ा है। सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए सामने आए दस्तावेजों ने दावा किया है कि कुछ वीआईपी और राजनीतिक हस्तियों के केदारनाथ प्रवास के दौरान भोजन, आवास और अन्य व्यवस्थाओं पर खर्च बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) के खाते से दर्शाया गया। खुलासे के बाद उत्तराखंड की राजनीति गरमा गई है और विपक्ष ने सरकार व मंदिर समिति को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि जिस धनराशि को श्रद्धालु भगवान के चरणों में आस्था स्वरूप अर्पित करते हैं, उसी के उपयोग को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि यदि दान की रकम वीआईपी मेहमाननवाज़ी में खर्च हुई है तो यह करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं के साथ अन्याय है। पार्टी ने संबंधित लोगों से राशि की वसूली और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
हालांकि जिन नेताओं के नाम खर्च के दस्तावेजों में बताए जा रहे हैं, उन्होंने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने केदारनाथ यात्रा और दर्शन अपने निजी खर्च पर किए तथा बीकेटीसी से किसी प्रकार की सुविधा नहीं ली। नेताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि यदि उन्होंने कोई सुविधा नहीं ली तो उनके नाम पर बिल कैसे तैयार हुए, इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
पहले भी विवादों में रही बीकेटीसी
यह पहला अवसर नहीं है जब बदरी-केदार मंदिर समिति विवादों में घिरी हो। इससे पहले केदारनाथ में लगाए गए QR कोड से दान संग्रह, मंदिर गर्भगृह में सोने की परत को लेकर उठे विवाद, चारधाम यात्रा के दौरान वीआईपी दर्शन व्यवस्था, मंदिर परिसर में रील बनाने की घटनाएं और नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद के आरोप भी सुर्खियां बटोर चुके हैं। हर बार समिति की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं।
बीजेपी भी जांच के पक्ष में
विपक्ष के हमलों के बीच बीजेपी ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की बात कही है। पार्टी का कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि सामने आए बिल वास्तविक हैं या किसी स्तर पर फर्जीवाड़ा हुआ है। दोषी चाहे कोई भी हो, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
बीकेटीसी अध्यक्ष का सख्त संदेश
विवाद बढ़ने के बाद बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी ने सभी संबंधित फाइलें और रिकॉर्ड तलब कर लिए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि मंदिर समिति करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी संस्था है और पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता है। यदि जांच में वित्तीय अनियमितता, फर्जी बिलिंग या किसी प्रकार का भ्रष्टाचार सामने आता है तो दोषी अधिकारी या कर्मचारी को किसी भी स्थिति में बख्शा नहीं जाएगा।
आस्था बनाम व्यवस्था का बड़ा सवाल
चारधाम यात्रा के दौरान वीआईपी संस्कृति को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। आम श्रद्धालु घंटों कतार में खड़े रहते हैं, जबकि प्रभावशाली लोगों को विशेष सुविधाएं मिलने के आरोप लगते रहे हैं। अब दान की राशि के कथित उपयोग का मुद्दा सामने आने के बाद सवाल केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और पारदर्शिता से भी जुड़ गया है।

