चीन की एक चर्चित कंटेंट क्रिएटर का हालिया लाइव सेशन अचानक इसलिए सुर्खियों में आ गया, क्योंकि प्रसारण के दौरान लगा ब्यूटी फिल्टर कुछ सेकंड के लिए बंद हो गया। इन चंद पलों में दर्शकों ने वह चेहरा देखा, जो डिजिटल चमक-दमक से परे था। एक बिल्कुल सामान्य, स्वाभाविक और मानवीय चेहरा। बस यहीं से शुरू हुई सोशल मीडिया पर बहस क्या हम असली चेहरों से असहज हो चुके हैं?
लाइव के दौरान सब कुछ सामान्य था। क्रिएटर मुस्कुरा रही थीं, दर्शकों से बातचीत कर रही थीं। फिल्टर की वजह से उनका चेहरा बेदाग, गोरा, चिकना और डॉल जैसा दिख रहा था। तभी अचानक तकनीकी गड़बड़ी से फिल्टर हट गया। सामने आया नैचुरल टेक्सचर, थोड़ी गहरी रंगत और साधारण लुक, यानी वही चेहरा, जो हर आम इंसान का होता है।
हैरानी की बात यह रही कि क्रिएटर ने घबराहट नहीं दिखाई। उन्होंने बाल ठीक किए, मुस्कुराईं और लाइव जारी रखा। कुछ ही सेकंड में फिल्टर फिर चालू हो गया और चेहरा दोबारा “परफेक्ट” दिखने लगा। लेकिन तब तक क्लिप रिकॉर्ड हो चुकी थी और वायरल हो गई।
बहस: धोखा या दबाव?
वायरल वीडियो के बाद सोशल मीडिया दो खेमों में बंट गया। एक पक्ष ने इसे दर्शकों के साथ धोखा बताया, कहा कि डिजिटल फिल्टर से अलग छवि पेश करना गलत है।
दूसरा पक्ष मानता है कि यह किसी व्यक्ति का अधिकार है कि वह खुद को जैसे चाहे प्रस्तुत करे। आखिर कैमरे के सामने परफेक्ट दिखने का दबाव कितना बड़ा है, यह भी समझना होगा।
बताया गया कि इस घटना के बाद क्रिएटर के करीब 1.4 लाख फॉलोअर्स कम हो गए। यह आंकड़ा सिर्फ एक व्यक्ति की लोकप्रियता का नहीं, बल्कि समाज के सौंदर्य मानकों की कठोरता का संकेत देता है।
डिजिटल ब्यूटी स्टैंडर्ड का संकट
चीन में लाइव स्ट्रीमिंग उद्योग तेजी से बढ़ा है। लाखों क्रिएटर घंटों लाइव रहते हैं, गाना, डांस, बातचीत या प्रोडक्ट प्रमोशन। यहां ब्यूटी फिल्टर आम बात हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन फिल्टरों ने हमारी वास्तविकता की परिभाषा बदल दी है?
आज सोशल मीडिया पर “परफेक्ट” दिखना एक अनकहा नियम बन गया है। स्मूद स्किन, चमकदार चेहरा, बड़ी आंखें, ये सब एल्गोरिदम और ऐप्स के जरिए गढ़े गए मानक हैं। ऐसे में जब अचानक असली चेहरा सामने आता है, तो वह हमें असहज कर देता है।
असल मुद्दा: स्वीकार्यता
यह घटना सिर्फ एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं थी। यह हमारे समाज के उस आईने की तरह है, जिसमें हम अपनी अपेक्षाओं और असुरक्षाओं को देख सकते हैं। सवाल यह नहीं कि फिल्टर लगाना सही है या गलत। असली सवाल यह है कि क्या हम बिना फिल्टर वाले चेहरे को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं?
शायद समय आ गया है कि डिजिटल दुनिया में भी स्वाभाविकता को जगह दी जाए। क्योंकि आखिरकार, परफेक्शन नहीं—प्रामाणिकता ही सबसे सुंदर होती है।

