जंगल से विकास तक… आदिवासी की जिद बड़ी या व्यवस्था की असफलता… ?

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तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडेम ज़िले की पहाड़ियों में पिछले 25 वर्षों से अकेला रह रहा गुरुगुंटला रेड्डैया का परिवार केवल एक मानवीय जिज्ञासा नहीं, बल्कि विकास के भारतीय मॉडल पर एक तीखा सवाल है। जब देश डिजिटल इंडिया, स्मार्ट विलेज और ट्रिलियन डॉलर इकॉनॉमी की बातें करता है, उसी समय एक आदिवासी परिवार बिना बिजली, फोन, स्वास्थ्य और शिक्षा के जंगल में जीवन गुज़ार रहा है—और यह उनकी “मजबूरी” नहीं, बल्कि उनकी “चुनौती” है।

यह कहानी सिर्फ़ जंगल में रहने की नहीं है, यह उस टकराव की कहानी है जहाँ राज्य की परिकल्पना और आदिवासी की जीवन-दृष्टि आमने-सामने खड़ी हैं। प्रशासन कहता है—“जंगल में सुविधाएँ नहीं दी जा सकतीं”, जबकि रेड्डैया का जीवन कहता है—“सुविधाएँ ही सब कुछ नहीं होतीं।” सवाल यह नहीं कि वे नीचे क्यों नहीं आए, सवाल यह है कि क्या विकास का मतलब केवल शहरों और कॉलोनियों तक सीमित हो गया है?

रेड्डैया और उनका बेटा गंगिरेड्डी व्यवस्था से नहीं, बल्कि उसके दबाव से डरते हैं। आधार, राशन, पुनर्वास—ये सब उनके लिए अधिकार नहीं, बल्कि उस बंधन की तरह हैं जो उन्हें उनके जंगल से अलग कर देगा। यही वजह है कि प्रशासन की हर कोशिश उन्हें “कल्याण” नहीं, “हस्तक्षेप” लगती है। यह डर निराधार भी नहीं है; देश के कई हिस्सों में आदिवासी पुनर्वास के नाम पर संस्कृति, पहचान और आत्मनिर्भरता खो चुके हैं।

लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यह “रोमांटिक एकांत” खतरों से खाली नहीं। स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, उम्र बढ़ने के साथ शारीरिक अक्षमता और जंगली जानवरों का जोखिम—ये सब वास्तविक हैं। लक्ष्मी का कम दिखाई देना और देसी इलाज पर निर्भर रहना व्यवस्था की अनुपस्थिति को उजागर करता है। सवाल यह है कि क्या राज्य की ज़िम्मेदारी यहीं खत्म हो जाती है कि “वे मान नहीं रहे”?

समाधान ज़बरदस्ती नहीं, सहमति है। विकास का एक वैकल्पिक रास्ता भी हो सकता है—जहाँ जंगल में रहकर भी न्यूनतम मानवीय सुविधाएँ मिलें। सोलर ऊर्जा, सुरक्षित शेड, स्वास्थ्य की मोबाइल इकाइयाँ और सम्मानजनक संवाद—ये सब संभव हैं, बशर्ते नीयत हो। आदिवासी जीवन को “पिछड़ा” मानकर नहीं, “भिन्न” मानकर देखा जाए।

रेड्डैया का परिवार हमें यह याद दिलाता है कि विकास का पैमाना सिर्फ़ इमारतें और सड़कें नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या हम किसी को उसकी जड़ों से काटे बिना बेहतर जीवन दे पा रहे हैं। जंगल में अकेला खड़ा यह परिवार दरअसल हमारी नीतियों के बीच खड़ा एक आईना है—जिसमें झांकना अब टाला नहीं जा सकता।