
उत्तराखंड की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब एक साल पहले कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरों में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश कर सियासी हलचल बढ़ा दी है। रावत ने उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारी सदस्यता और कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य पद से हटने की घोषणा की है। उनका यह फैसला उनके पूर्व ओएसडी और करीबी सहयोगी चंदन सिंह जीना के ठिकाने पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद सामने आया है।
रावत ने कहा है कि जब राहुल गांधी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं, ऐसे समय में उनके करीबी सहयोगी पर लगे आरोपों से पार्टी के संघर्ष और उसकी छवि कमजोर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जीना को सज्जन और ईमानदार व्यक्ति बताते हुए आरोपों पर विश्वास नहीं जताया और कहा कि जांच के बाद सच्चाई सामने आएगी। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनकी सरकार के कार्यकाल से जुड़ी किसी गलती में उनकी कोई भूमिका सामने आती है तो वह जवाबदेही से पीछे नहीं हटेंगे।
ईडी की कार्रवाई 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित गड़बड़ी की जांच से जुड़ी बताई जा रही है। कार्रवाई के दौरान नकदी, सोना और अन्य कीमती सामान मिलने की रिपोर्ट सामने आई है। हालांकि मामले की जांच अभी जारी है और आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
अंदरूनी कलह का सवाल भी अहम
रावत का कदम ऐसे समय आया है, जब कांग्रेस उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव की तैयारी तेज कर रही है। पार्टी नेतृत्व लगातार संगठन को सक्रिय करने और भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दे उठाने पर जोर दे रहा है। ऐसे में रावत का अचानक संगठनात्मक पदों से अलग होने का प्रस्ताव कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, चुनावी रणनीति और वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को लेकर नई चर्चा छेड़ सकता है।
राजनीतिक जानकारों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल पार्टी की छवि को बचाने के लिए उठाया गया नैतिक कदम है या रावत और कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान का भी कोई पहलू है। 2027 में सत्ता वापसी की कोशिश कर रही कांग्रेस के लिए रावत अब भी राज्य के सबसे प्रभावशाली चेहरों में हैं। इसलिए उनका पद छोड़ना संगठन से दूरी का संकेत है या चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक भूमिका नए सिरे से तय करने की तैयारी, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।




