
हल्द्वानी। कुछ लोग अपनी कुर्सी से नहीं, अपने व्यवहार से पहचाने जाते हैं। उनके पद का परिचय भले ही जिला सूचना अधिकारी का रहा हो, लेकिन पत्रकारों के बीच गिरिजा शंकर जोशी की पहचान इससे कहीं बड़ी थी। वह सहजता से मिलते थे, ध्यान से सुनते थे, मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे और बातचीत के बीच उनके चेहरे पर खिली रहने वाली मुस्कान सामने वाले को अपनेपन का अहसास करा देती थी। शनिवार को उनका अचानक निधन हुआ तो लगा जैसे शहर की पत्रकारिता के बीच से एक जाना-पहचाना, आत्मीय चेहरा अचानक गायब हो गया हो। वह मुस्कुराता चेहरा अब हमेशा के लिए शांत हो गया।
नैनीताल के जिला सूचना अधिकारी गिरिजा शंकर जोशी के आकस्मिक निधन की खबर ने पत्रकारिता जगत, सूचना विभाग, प्रशासनिक महकमे और उनके परिचितों को भीतर तक हिला दिया। हृदय गति रुकने से उनका निधन हुआ। शनिवार दोपहर करीब एक बजे वह किसी काम से घर से निकलने की तैयारी कर रहे थे। इसी दौरान अचानक चक्कर आने से वह गिर पड़े। परिजन उन्हें तत्काल निजी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
जिस व्यक्ति से कुछ घंटे पहले तक बातचीत, काम और सहज हंसी-मजाक का सिलसिला चलता रहा हो, उसके अचानक चले जाने की खबर को स्वीकार करना किसी के लिए आसान नहीं था। सूचना मिलते ही उनके विठोरिया नंबर-1 स्थित वीके पुरम आवास पर पत्रकारों, अधिकारियों, कर्मचारियों और शुभचिंतकों का पहुंचना शुरू हो गया। वहां मौजूद हर व्यक्ति के पास कहने के लिए शब्द कम थे और यादें बहुत ज्यादा।

पद से अधिक व्यवहार ने बनाई पहचान
गिरिजा शंकर जोशी उन अधिकारियों में रहे, जिनसे मिलने के लिए किसी औपचारिकता की दीवार महसूस नहीं होती थी। मृदुभाषी स्वभाव, सहज संवाद और हंसमुख व्यक्तित्व उनकी सबसे बड़ी पहचान थे। पत्रकार किसी काम से उनके पास पहुंचते तो वह केवल फाइल या नियम की भाषा में बात करने वाले अधिकारी नहीं मिलते थे। सामने वाले की बात सुनना, उसकी परेशानी समझना और संभव हो तो समाधान का रास्ता तलाशना उनकी कार्यशैली का हिस्सा था।
यही कारण है कि पत्रकारों के बीच उनका रिश्ता महज विभागीय संपर्क का नहीं रहा। वह पत्रकारों के लिए एक ऐसे अधिकारी रहे, जिनके पास काम लेकर जाने में संकोच नहीं होता था। उनकी सहजता ने सूचना विभाग और पत्रकारों के बीच संवाद को भी आत्मीय बनाया।
पत्रकारों के हित में छोड़ी अपनी छाप
अपने कार्यकाल के दौरान जोशी ने पत्रकारों से जुड़ी कई महत्वपूर्ण पहलों को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई। हल्द्वानी में नए मीडिया सेंटर की नींव और पत्रकारों के लिए प्रस्तावित गेस्ट हाउस जैसी पहल उनके कार्यकाल की उल्लेखनीय उपलब्धियों में शामिल रही। इन पहलों के पीछे केवल विभागीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पत्रकारों की जरूरतों को समझने की उनकी कोशिश भी दिखाई देती थी।
पत्रकारों की समस्याओं को सुनना और उनके लिए सकारात्मक प्रयास करना उनकी आदत में शामिल था। शायद यही वजह है कि उनके निधन की खबर पर शोक केवल सूचना विभाग तक सीमित नहीं रहा। पत्रकारों के बीच उनके जाने का दुख कुछ ऐसा था, जैसे किसी परिचित अधिकारी का नहीं, अपने बीच के किसी सहयोगी का जाना हो।
आवास पर उमड़ा शोक
उनके निधन की सूचना मिलते ही सांसद अजय भट्ट, जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल, एसएसपी डॉ. मंजूनाथ टीसी, सिटी मजिस्ट्रेट एपी बाजपेई, एसडीएम मोनिका आर्य, सेवानिवृत्त सहायक सूचना निदेशक योगेश मिश्रा, ऊधम सिंह नगर के सूचनाधिकारी गोविंद सिंह बिष्ट, मीडिया सलाहकार ध्रुव रौतेला, वरिष्ठ पत्रकार संजय तलवार, दिलीप सिंह गड़िया, भगवान सिंह गंगोला समेत पुलिस-प्रशासन के अधिकारी और बड़ी संख्या में पत्रकार उनके आवास पहुंचे। सभी ने दिवंगत अधिकारी को श्रद्धांजलि दी और शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाया।
जिला सूचना कार्यालय, लालकुआं और हल्दूचौड़ प्रेस क्लब से जुड़े पत्रकारों समेत विभिन्न पत्रकार संगठनों, अधिकारियों और कर्मचारियों ने भी उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। सबकी जुबान पर उनकी वही पहचान थी। सहज आदमी, मीठी बोली, चेहरे पर मुस्कान और मदद के लिए हमेशा आगे।

पीछे रह गईं मुस्कुराती यादें
गिरिजा शंकर जोशी अपने पीछे पत्नी निशा जोशी, पुत्र ओंकार जोशी और एक पुत्री समेत भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। परिवार के लिए यह केवल किसी अपने को खोने का दुख नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के अचानक चले जाने का आघात है, जिसके साथ जीवन की रोजमर्रा की खुशियां और जिम्मेदारियां जुड़ी थीं।
लेकिन किसी इंसान के जाने के बाद उसकी सबसे बड़ी मौजूदगी उसकी यादों में होती है। जोशी की याद भी शायद उनके पद, आदेशों या सरकारी जिम्मेदारियों से नहीं, बल्कि उनकी मुस्कान, सहज बातचीत और मदद के लिए बढ़े हाथ से की जाएगी।
उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले लोगों के हाथों में शायद फूल होंगे, आंखों में नमी होगी और मन में उनकी अनगिनत यादें। कोई उनकी कही बात याद करेगा, कोई उनके साथ हुई आखिरी मुलाकात, कोई वह मुस्कान जिसे देखकर तनाव के बीच भी माहौल सहज हो जाता था।
किसी अधिकारी की विदाई उसकी सेवा अवधि के साथ हो जाती है, लेकिन किसी अच्छे इंसान की मौजूदगी उसके जाने के बाद भी लोगों के व्यवहार और स्मृतियों में बनी रहती है। गिरिजा शंकर जोशी भी शायद इसी वजह से लंबे समय तक याद किए जाएंगे। जिला सूचना अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि उस मुस्कुराते चेहरे के रूप में, जो हर किसी के लिए सहजता से उपलब्ध रहता था।
अब वह चेहरा सामने नहीं होगा। आवाज सुनाई नहीं देगी। मदद के लिए वह सहज आश्वासन नहीं मिलेगा। लेकिन जिन लोगों ने उनके साथ काम किया, उनसे मिले और उनके व्यवहार को महसूस किया, उनके लिए गिरिजा शंकर जोशी की मुस्कान शायद लंबे समय तक वैसी ही बनी रहेगी। एक ऐसी स्मृति, जिसे समय भी धुंधला नहीं कर पाएगा।
ॐ शांति




