देश में होने वाली हर जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं होती, बल्कि यह भविष्य की नीतियों की दिशा तय करने वाला आधार दस्तावेज होती है। वर्ष 2026 की जनगणना को लेकर जिस तरह डिजिटल व्यवस्था और स्वगणना की नई पहल सामने आई है, वह इसे ऐतिहासिक बना रही है। विशेष रूप से उत्तराखंड में 25 अप्रैल से प्रस्तावित मकान सूचीकरण एवं गणना कार्य से पहले 9 अप्रैल से स्वगणना प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी यह संकेत देती है कि प्रशासन अब तकनीक के सहारे जनभागीदारी को नए स्तर पर ले जाना चाहता है।
पहली बार नागरिक होंगे सीधे भागीदार
अब तक जनगणना का अर्थ था कि सरकारी गणनाकर्मी घर-घर जाकर जानकारी एकत्र करें। लेकिन इस बार नागरिक स्वयं पोर्टल पर जाकर अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे। यह बदलाव केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सोच का परिवर्तन है।
भारत सरकार का गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार जनगणना दो चरणों में होगी। पहले चरण में मकान सूचीकरण और दूसरे चरण में जनसंख्या गणना। परंतु स्वगणना का विकल्प इस पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सहभागी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
जब नागरिक स्वयं अपनी जानकारी भरेंगे, तो न केवल उनका समय बचेगा, बल्कि आंकड़ों की शुद्धता भी बढ़ेगी। साथ ही गणनाकर्मियों को केवल सत्यापन करना होगा, जिससे कार्य की गति तेज होगी।
उत्तराखंड के संदर्भ में महत्व
पहाड़ी राज्य होने के कारण उत्तराखंड में कई दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्र हैं, जहां पारंपरिक तरीके से डेटा संग्रह करना चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे में डिजिटल स्वगणना व्यवस्था प्रशासन के लिए राहत साबित हो सकती है।
हालांकि, यहां एक चुनौती भी है कि डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट कनेक्टिविटी। प्रदेश के पर्वतीय इलाकों में अभी भी नेटवर्क की समस्या बनी हुई है। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि स्वगणना सुविधा केवल शहरों तक सीमित न रह जाए, बल्कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के लोग भी इसका लाभ उठा सकें।
31 सवालों के पीछे नीति निर्माण की सोच
मकान सूचीकरण के दौरान भवन की स्थिति, निर्माण सामग्री, पानी-बिजली की उपलब्धता, शौचालय, रसोई, ईंधन, इंटरनेट, वाहन, परिवार के सदस्यों की संख्या जैसे 31 प्रश्न पूछे जाएंगे। यह केवल औपचारिक जानकारी नहीं है।
इन्हीं आंकड़ों के आधार पर
- आवास योजनाएं बनती हैं
- पेयजल और स्वच्छता मिशन की दिशा तय होती है
- बिजली, सड़क और इंटरनेट कनेक्टिविटी की प्राथमिकताएं तय होती हैं
- सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षणों को मजबूती मिलती है
- यदि नागरिक सही और सटीक जानकारी देंगे, तो योजनाएं भी जमीनी हकीकत के अनुरूप बन सकेंगी।
पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी
स्वगणना से एक और बड़ा बदलाव आएगा, जवाबदेही। जब नागरिक स्वयं जानकारी दर्ज करेंगे और उन्हें यूनिक आईडी प्राप्त होगी, तो बाद में आंकड़ों की सत्यता को लेकर विवाद की संभावना कम होगी।
लेकिन इसके साथ ही डेटा सुरक्षा भी एक अहम मुद्दा है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि नागरिकों द्वारा दी गई व्यक्तिगत जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी और उसका दुरुपयोग नहीं होगा। डिजिटल भरोसा बनाए रखना इस पहल की सफलता की शर्त है।
जनगणना: आंकड़ों से आगे की कहानी
जनगणना केवल जनसंख्या गिनने की प्रक्रिया नहीं है। यह समाज की आर्थिक, सामाजिक और संरचनात्मक स्थिति का आईना है। डिजिटल और स्वगणना आधारित जनगणना यह संकेत देती है कि भारत अब डेटा-आधारित शासन (Data Driven Governance) की ओर तेजी से बढ़ रहा है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो भविष्य में अन्य सर्वेक्षण और सरकारी प्रक्रियाएं भी इसी मॉडल पर आधारित हो सकती हैं।
स्वगणना का विकल्प जनगणना प्रक्रिया में नागरिकों को सहभागी बनाने की एक सकारात्मक और दूरदर्शी पहल है। परंतु इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि
- क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म सहज और सुरक्षित होगा?
- क्या दूरदराज क्षेत्रों तक इसकी पहुंच सुनिश्चित होगी?
- क्या नागरिकों को पर्याप्त जागरूक किया जाएगा?
- यदि इन सवालों के जवाब सकारात्मक रहे, तो 2026 की जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी का एक नया अध्याय साबित होगी।

