खाड़ी संकट की आंच और भारत की ऊर्जा चुनौती

Spread the love

मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब केवल क्षेत्रीय राजनीतिक संकट नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। खाड़ी क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बनने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी है और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों पर पड़ रहा है।

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। एलपीजी की बात करें तो करीब 90 प्रतिशत गैस मिडिल ईस्ट से आती है। ऐसे में अगर खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री मार्गों पर खतरा पैदा होता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि देश के कई बड़े शहरों मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद और बेंगलुरु में कमर्शियल एलपीजी सिलेंडरों की कमी दिखाई देने लगी है और होटल-रेस्टोरेंट उद्योग चिंता में है।

सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए गैस सप्लाई में प्राथमिकता बदलते हुए पहले घरों में सिलेंडर पहुंचाने का फैसला लिया है। यह निर्णय आम लोगों के हित में है, क्योंकि घरेलू स्तर पर लाखों परिवार अभी भी रसोई गैस पर ही निर्भर हैं। लेकिन इसके साथ ही यह स्थिति यह भी दिखाती है कि भारत की ऊर्जा व्यवस्था किस हद तक वैश्विक परिस्थितियों से प्रभावित होती है।

खाड़ी क्षेत्र में यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो केवल गैस ही नहीं बल्कि पेट्रोल-डीजल, बिजली उत्पादन और उद्योगों पर भी दबाव बढ़ सकता है। समुद्री मार्गों खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर किसी भी तरह का खतरा पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार को हिला सकता है।

यह स्थिति भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी है। लंबे समय से ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने और सप्लाई स्रोतों में विविधता लाने की जरूरत पर चर्चा होती रही है। अब समय आ गया है कि वैकल्पिक ऊर्जा, घरेलू उत्पादन और नए अंतरराष्ट्रीय सप्लायरों की तलाश को तेजी से आगे बढ़ाया जाए।

खाड़ी संकट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया के किसी एक क्षेत्र में पैदा हुआ तनाव भारत के घर-घर की रसोई और उद्योगों तक असर डाल सकता है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा को केवल आर्थिक नहीं बल्कि रणनीतिक मुद्दे के रूप में देखने की जरूरत है। आने वाले समय में भारत को अपनी ऊर्जा नीति को और अधिक मजबूत, विविध और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।