दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट का लैंड फॉर जॉब मामले में दिया गया आदेश केवल एक कानूनी प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में सत्ता के दुरुपयोग पर एक गहरी टिप्पणी भी है। अदालत द्वारा लालू प्रसाद यादव, उनके पुत्र तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव सहित परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ आरोप तय किए जाना यह दर्शाता है कि न्यायपालिका ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और जांच एजेंसियों की चार्जशीट में प्रथम दृष्टया दम पाया है।
अदालत की यह टिप्पणी कि लालू यादव और उनका परिवार “एक आपराधिक गिरोह की तरह” काम कर रहा था, बेहद गंभीर है। यह टिप्पणी केवल किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर सवाल खड़े करती है, जहां सत्ता को सेवा का माध्यम नहीं बल्कि निजी लाभ का औजार बना लिया जाता है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह मामला साबित करेगा कि किस तरह सरकारी नौकरियों जैसे संवेदनशील और जनहित से जुड़े क्षेत्र को सौदेबाजी का माध्यम बनाया गया।
लैंड फॉर जॉब स्कैम का मूल लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा पर चोट करता है। रेलवे जैसी राष्ट्रीय संस्था में भर्ती प्रक्रिया का कथित तौर पर बिना विज्ञापन, बिना पारदर्शिता और जल्दबाजी में पूरा किया जाना यह संकेत देता है कि योग्य उम्मीदवारों के हक को दरकिनार किया गया। बदले में जमीन को बेहद कम दामों पर अपने नाम कराना न केवल भ्रष्टाचार है, बल्कि सामाजिक अन्याय भी है।
हालांकि अदालत द्वारा 52 लोगों को बरी किया जाना यह भी दर्शाता है कि न्यायिक प्रक्रिया संतुलन के साथ आगे बढ़ रही है। दोषारोपण के साथ-साथ निर्दोषों को राहत देना कानून के राज की मजबूती का संकेत है। यही वजह है कि इस मामले को राजनीतिक बदले की कार्रवाई कहकर खारिज करना आसान नहीं रह जाता।
अब यह जिम्मेदारी अदालत की है कि वह साक्ष्यों के आधार पर अंतिम निर्णय दे, लेकिन इससे पहले यह जिम्मेदारी राजनीति की भी बनती है कि वह आत्ममंथन करे। सत्ता में रहते हुए नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही को नजरअंदाज करने की कीमत अंततः चुकानी ही पड़ती है।
लैंड फॉर जॉब मामला एक चेतावनी है—सिर्फ नेताओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के लिए—कि लोकतंत्र में कुर्सी अस्थायी होती है, लेकिन कानून और जनता की नजर स्थायी।

