भारत में होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, उल्लास और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है। पौराणिक कथाओं में होलिका दहन से लेकर भगवान कृष्ण की ब्रज की रंगभरी लीलाओं तक, यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत और प्रेम के विस्तार का संदेश देता है। लेकिन बदलते समय में जब रंगों की चमक बढ़ी है, तब मध्यम वर्गीय परिवारों की चिंताएं भी गहरी हुई हैं।
होली का उत्साह बाजारों में साफ दिखाई देता है। रंग, पिचकारी, मावा, मिठाइयाँ, कपड़े, सबकी कीमतों में तेजी से वृद्धि हो रही है। जो मावा बीते वर्ष 300 रुपये किलो था, वह अब 400 रुपये के पार पहुंच गया है। रसोई का बजट पहले ही गैस सिलेंडर, सब्जियों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों से प्रभावित है। ऐसे में होली का अतिरिक्त खर्च मध्यम परिवार के लिए संतुलन का बड़ा सवाल बन जाता है।
मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है “प्रतिष्ठा और परंपरा दोनों निभाना।” वह त्योहार की खुशी भी बनाए रखना चाहता है और मासिक बजट भी नहीं बिगाड़ना चाहता। बच्चों की जिद, रिश्तेदारों की आवभगत, समाज में सहभागिता, इन सबके बीच परिवार का मुखिया हिसाब-किताब में उलझा रहता है। बाहर से घर रंगों में सराबोर दिखता है, लेकिन भीतर आर्थिक गणित की कशमकश चलती रहती है।
फिर भी यही वर्ग है जो हर परिस्थिति में संतुलन बनाना जानता है। कम संसाधनों में भी प्रेम के रंग घोलना, घर की बनी गुझिया से मिठास बढ़ाना और सादगी में आनंद खोजना, मध्यम वर्ग की यही ताकत है। दिखावे से दूर, आत्मीयता से भरी होली ही इस वर्ग की असली पहचान है।
आवश्यकता इस बात की है कि बाजार भी त्योहारों को केवल मुनाफे का अवसर न माने, बल्कि सामाजिक संवेदना को समझे। मिलावट और कृत्रिम महंगाई पर नियंत्रण हो, ताकि हर परिवार सुकून से त्योहार मना सके।
अंततः होली रंगों का नहीं, संबंधों का त्योहार है। जब तक घर में अपनापन और दिलों में स्नेह है, तब तक किसी भी बजट की सीमा इस उत्सव की चमक को फीका नहीं कर सकती। मध्यम वर्ग की सादगी भरी होली ही असल भारत की तस्वीर है, जहां कम साधनों में भी खुशियों के रंग सबसे गहरे होते हैं।

