तिब्बत में 4.4 का भूकंप, फिर पहाड़ से टूटी बर्फ-चट्टानों की दीवार… ऐसे नेपाल में आई जलप्रलय

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नेपाल में बुधवार सुबह आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड को लेकर अब जो तस्वीर सामने आ रही है, वह सामान्य बारिश और नदी में अचानक बढ़े पानी से कहीं ज्यादा गंभीर है। शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, नेपाल-तिब्बत सीमा के ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में हुई भौगोलिक हलचल के बाद बर्फ और चट्टानों का बड़ा हिस्सा खिसका, जिससे ल्हेंदे नदी का प्रवाह बाधित हुआ। इसके बाद जमा पानी अचानक नीचे की ओर टूट पड़ा और भोटेकोशी तथा त्रिशूली नदी तंत्र में विनाशकारी बाढ़ आ गई।

यही वजह है कि नेपाल के रसुवा जिले में बुधवार सुबह लोगों को सामान्य बाढ़ की तरह तैयारी करने का मौका तक नहीं मिला। 26 अगस्त की सुबह तिब्बती क्षेत्र में 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण के अनुसार इसका केंद्र गोसाइंकुंड से करीब 47 किलोमीटर उत्तर में था। इसके आसपास का इलाका ऊंचे हिमालय, ग्लेशियरों और अस्थिर ढलानों वाला क्षेत्र है।

वैज्ञानिक अभी यह जांच रहे हैं कि इस भूकंप ने पहाड़ी ढलान पर मौजूद बर्फ और चट्टानों को अस्थिर करने में भूमिका निभाई या नहीं। शुरुआती आकलन में एक आइस एवलांच या आइस-रॉक एवलांच के ल्हेंदे नदी के रास्ते में आ जाने की बात सामने आई है। इसके बाद नदी का पानी सामान्य तरीके से नीचे नहीं आ सका। पानी ऊपर जमा होता गया और जब प्राकृतिक अवरोध टूटा तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर बह निकला।

भूकंप → पहाड़/बर्फ-चट्टान का खिसकना → नदी का रास्ता बाधित → पानी का अचानक जमा होना → प्राकृतिक अवरोध टूटना → फ्लैश फ्लड → नेपाल में भारी तबाही।

हालांकि यह पूरी कड़ी अभी वैज्ञानिक जांच का विषय है और इसे अंतिम कारण नहीं माना गया है।

विशेषज्ञों के मुताबिक इस इलाके में कई बड़ी ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। पिछले साल 8 जुलाई को भी इसी क्षेत्र में अचानक बाढ़ आई थी, जिसकी जांच में ग्लेशियल झील के फटने यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की भूमिका सामने आई थी। सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण से भी उस घटना की पुष्टि हुई थी।

इस बार भी वैज्ञानिक इस संभावना को खारिज नहीं कर रहे हैं कि बर्फ और चट्टानों के खिसकने से कहीं प्राकृतिक झील या पानी का अस्थायी जलाशय बना हो और बाद में वह अचानक टूट गया हो। नेपाल के जल तथा मौसम विज्ञान विभाग ने भी ग्लेशियल झील फटने की संभावना की जांच की बात कही है। खास बात यह है कि विभाग के अनुसार रसुवा इलाके में मंगलवार और बुधवार को ऐसी भारी बारिश नहीं हुई थी, जो इस स्तर की अचानक बाढ़ को अकेले समझा सके।

कुछ ही देर में बदल गया पूरा इलाका

फ्लैश फ्लड ने रसुवा जिले के तिमुरे, स्याफ्रुबेसी और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई। घर, सड़कें, पुल, सीमा क्षेत्र की सुविधाएं और हाइड्रोपावर परियोजनाएं इसकी चपेट में आईं।

बाढ़ का पानी आगे बढ़ते हुए निचले इलाकों तक पहुंचा और भोटेकोशी से त्रिशूली नदी तंत्र में भी खतरा बढ़ गया। कई जगह संपर्क व्यवस्था प्रभावित हुई, जिससे राहत और बचाव अभियान भी मुश्किल हो गया। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। इनमें स्थानीय लोगों के साथ हाइड्रोपावर परियोजनाओं से जुड़े कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी और पर्यटक भी शामिल हैं। अलग-अलग समय पर जारी आंकड़ों में बड़ा अंतर है और बचाव अभियान के साथ संख्या लगातार बदल रही है।

105 भारतीयों के लापता होने की खबर

इस आपदा का असर भारत से नेपाल जाने वाले यात्रियों पर भी पड़ा है। शुरुआती सूचियों में 100 से अधिक भारतीय यात्रियों के लापता होने की जानकारी सामने आई थी। एक रिपोर्ट में नेपाल पर्यटन बोर्ड की प्रारंभिक सूची के आधार पर 105 भारतीयों समेत 384 यात्रियों के लापता होने की बात कही गई थी। इनकी स्थिति की पुष्टि की प्रक्रिया जारी थी।

इससे यह आपदा केवल नेपाल की स्थानीय त्रासदी नहीं रह गई है, बल्कि भारत समेत कई देशों के नागरिकों के लिए भी चिंता का विषय बन गई है।

आने वाले दिनों के लिए भी खतरे की घंटी …?

हिमालय में इस घटना का सबसे बड़ा सबक सिर्फ आज की तबाही नहीं, बल्कि भविष्य का खतरा है। ग्लेशियरों के पीछे हटने, नई ग्लेशियल झीलों के बनने और पुरानी झीलों के अस्थिर होने के कारण ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। इसके साथ ही सड़क, सुरंग, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य निर्माण गतिविधियों के कारण संवेदनशील पहाड़ी ढलानों पर दबाव भी बढ़ता है।

नेपाल में पिछले साल इसी नदी तंत्र में ऐसी घटना हो चुकी है। इस बार फिर अचानक पानी का सैलाब सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि हिमालय के ऊपरी हिस्सों में होने वाले बदलावों की जानकारी निचले इलाकों तक कितनी तेजी से पहुंचती है।