देहरादून। उत्तराखंड के जंगल केवल हरियाली का विस्तार नहीं हैं, बल्कि सदियों पुरानी आस्था, संस्कृति और लोक परंपराओं की जीवंत पहचान भी हैं। प्रदेश के अनेक गांवों में ऐसे पवित्र वन मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय लोग देववन या आस्था वन मानते हैं। धार्मिक मान्यताओं के कारण इन वनों में पेड़ों की कटाई नहीं की जाती और इन्हें देवस्थल की तरह संरक्षित रखा जाता है। अब इन पवित्र वनों के संरक्षण और वैज्ञानिक विकास के लिए केंद्र सरकार की नई पहल उत्तराखंड को भी बड़ा लाभ देने जा रही है।
देशभर में शुरू की जा रही आस्था वन संरक्षण योजना के तहत ऐसे वनों की पहचान कर उनका संरक्षण, पुनर्जीवन और वैज्ञानिक तरीके से विकास किया जाएगा। योजना का उद्देश्य केवल पेड़ों को बचाना नहीं, बल्कि उनसे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत, जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों को भी सुरक्षित रखना है। इस अभियान के लिए वर्ष 2030-31 तक हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाने का लक्ष्य रखा गया है।
उत्तराखंड के देववन क्यों हैं खास?
उत्तराखंड में गढ़वाल और कुमाऊं के कई इलाकों में ऐसे वन हैं, जिन्हें स्थानीय लोग ग्राम देवता या क्षेत्रीय देवी-देवताओं का निवास मानते हैं। वर्षों से चली आ रही परंपराओं के कारण इन जंगलों में पेड़ों की कटाई पर सामाजिक रोक रही है। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में आज भी दुर्लभ वनस्पतियां, औषधीय पौधे, प्राकृतिक जलस्रोत और अनेक वन्यजीव सुरक्षित बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन वनों ने केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब इन्हें वैज्ञानिक संरक्षण मिलने से इनकी उपयोगिता और बढ़ेगी।
नई योजना के तहत चयनित आस्था वनों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया जाएगा। जहां आवश्यकता होगी वहां पौधारोपण, प्राकृतिक पुनर्जीवन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप संरक्षण कार्य किए जाएंगे। साथ ही जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने, वन्यजीवों के सुरक्षित आवास विकसित करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने की दिशा में भी काम होगा।
योजना में स्थानीय ग्रामीणों और वन पंचायतों की भागीदारी को विशेष महत्व दिया जाएगा, ताकि संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम न रहकर जनभागीदारी का अभियान बन सके।
राज्य में शुरू होगी पहचान और कार्ययोजना
उत्तराखंड में अब ऐसे सभी आस्था वनों की सूची तैयार की जाएगी। वन विभाग इनकी पहचान कर विस्तृत कार्ययोजना बनाएगा, जिसके बाद प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे जाएंगे। स्वीकृति मिलने पर विभिन्न क्षेत्रों में संरक्षण और विकास से जुड़े कार्य शुरू होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है तो उत्तराखंड में जंगलों की सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण परंपराएं भी मजबूत होंगी। इससे आने वाली पीढ़ियों को प्राकृतिक धरोहर और सांस्कृतिक विरासत दोनों सुरक्षित रूप में मिल सकेंगी। साथ ही पर्यटन, पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण के क्षेत्र में भी इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं।
राज्य सरकार का कहना है कि उत्तराखंड में बड़ी संख्या में आस्था से जुड़े वन मौजूद हैं। ऐसे में इस योजना का लाभ प्रदेश को स्वाभाविक रूप से मिलेगा। वन विभाग को इन वनों की पहचान कर विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने और केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने के निर्देश दिए जा चुके हैं।
इस पहल से उत्तराखंड के उन पवित्र जंगलों को नई पहचान मिलने की उम्मीद है, जिन्हें स्थानीय समाज सदियों से अपनी आस्था और परंपरा के बल पर सुरक्षित रखता आया है। अब आधुनिक वैज्ञानिक संरक्षण और पारंपरिक विश्वास का यह मेल देवभूमि की प्राकृतिक धरोहर को और मजबूत बनाने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है।


