ऊंची दीवारों के पीछे कैद थी जिंदगी: पिटबुल के पहरे में 2 साल तक बंधुआ बने रहे 13 मजदूर, एक की हिम्मत ने खोला राज

Spread the love

मुजफ्फरनगर। ऊंची दीवारों से घिरी एक साधारण दिखने वाली झोला फैक्ट्री के भीतर ऐसा सच छिपा था, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। यहां 13 मजदूर पिछले करीब दो वर्षों से कथित तौर पर बंधुआ मजदूरी करने को मजबूर थे। उन्हें न केवल परिवार और बाहरी दुनिया से काट दिया गया था, बल्कि फैक्ट्री से भागने से रोकने के लिए पिटबुल कुत्तों का पहरा भी लगाया गया था।

मामले का खुलासा तब हुआ जब एक मजदूर किसी तरह फैक्ट्री से निकलने में सफल हो गया। उसने पुलिस तक पहुंचकर अपनी आपबीती सुनाई, जिसके बाद श्रम विभाग और जिला प्रशासन की संयुक्त टीम ने फैक्ट्री पर छापा मारा। कार्रवाई के दौरान 13 मजदूरों को वहां से सुरक्षित बाहर निकाला गया।

मुक्त कराए गए मजदूरों ने बताया कि उन्हें अच्छी नौकरी और मोटी तनख्वाह का लालच देकर यहां लाया गया था। लेकिन फैक्ट्री पहुंचते ही उनके मोबाइल फोन और आधार कार्ड छीन लिए गए। इसके बाद उनका परिवारों से संपर्क पूरी तरह खत्म हो गया।

पीड़ितों के अनुसार उन्हें पर्याप्त भोजन भी नहीं दिया जाता था। कई मजदूरों का आरोप है कि उन्हें 24 घंटे में केवल एक बार सूखी रोटी दी जाती थी। विरोध करने या भागने की कोशिश करने वालों की लाठी और कोड़ों से पिटाई की जाती थी। कई मजदूरों के शरीर पर चोट के निशान भी मिले हैं।

रेस्क्यू किए गए मजदूरों में रामू, विक्रम, नारायण, सीताराम, संतोष, शिवम जाटव, जगदीश, राजहंस, साहिल, रंजीत पासवान, दिलशाद, उज्ज्वल और सोनू चौहान शामिल हैं। ये मजदूर उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और नेपाल से लाए गए थे।

पुलिस ने मामले में फैक्ट्री संचालकों शिवम त्यागी और प्रदीप बालियान को गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि लंबे समय तक कथित बंधुआ मजदूरी के दौरान किसी मजदूर की मौत तो नहीं हुई।

दो साल तक कैद जैसी जिंदगी झेलने के बाद आज ये मजदूर आजाद हैं। लेकिन उनके जख्म इस बात की गवाही देते हैं कि मजदूरी के नाम पर शोषण की यह कहानी कितनी भयावह थी। फिलहाल प्रशासन ने सभी मजदूरों का मेडिकल परीक्षण कराकर उन्हें उनके घर भेजने की व्यवस्था की है, जबकि मामले की जांच जारी है।