देवभूमि की साख पर दाग या सियासत का शोर? 

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देहरादून। उत्तराखंड के मुद्दे आमतौर पर संसद की प्राथमिकता नहीं बनते। लेकिन बीते कुछ महीनों में तस्वीर बदली है। राज्य की कई घटनाएं सड़कों से निकलकर लोकसभा और राज्यसभा तक पहुंचीं। विपक्ष ने इन्हें कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बताया, तो सरकार ने त्वरित कार्रवाई और निष्पक्ष जांच का दावा किया। सवाल यह है क्या उत्तराखंड वाकई अस्थिर दौर से गुजर रहा है, या राजनीतिक विमर्श ने घटनाओं को राष्ट्रीय बहस में बदल दिया है?

भर्ती घोटाले: युवाओं का टूटा भरोसा

भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, खासकर उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) से जुड़े मामलों ने लाखों युवाओं को झकझोर दिया। सड़कों पर प्रदर्शन हुए, पारदर्शी जांच की मांग उठी।

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी सहित कई नेताओं ने इसे राष्ट्रीय मंच पर उठाया। राज्य सरकार ने पहले एसआईटी और बाद में सीबीआई जांच की सिफारिश कर निष्पक्षता का संदेश देने की कोशिश की। विपक्ष का सवाल अब भी कायम है कि क्या शुरुआत से सख्ती होती तो हालात यहां तक पहुंचते?

अंकिता भंडारी हत्याकांड: न्याय की प्रतीक्षा और सियासी तकरार

अंकिता भंडारी हत्याकांड पहले ही राज्य को झकझोर चुका था। हाल में मामला दोबारा चर्चा में आया तो राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई।

सरकार ने पारदर्शिता का भरोसा दिलाया, जबकि विपक्ष ने जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए। इस प्रकरण ने यह दिखाया कि संवेदनशील मामलों में समय और पारदर्शिता दोनों ही निर्णायक होते हैं।

एंजेल चकमा मामला: राज्य से राष्ट्रीय विमर्श तक

त्रिपुरा की छात्रा एंजेल चकमा की मौत ने छात्र सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा किया। यह मुद्दा उत्तराखंड की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया। पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया, लेकिन विपक्ष ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग जारी रखी।

राजधानी में अपराध और बढ़ती चिंता

फरवरी में देहरादून में 16 दिनों के भीतर पांच हत्याओं ने कानून-व्यवस्था पर बहस छेड़ दी। हरिद्वार समेत अन्य जिलों में हुई घटनाओं ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दिया। जनता के मन में असुरक्षा की भावना का जिक्र विपक्ष लगातार कर रहा है, जबकि सरकार का दावा है कि अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की गई है।

कोटद्वार विवाद: स्थानीय घटना, राष्ट्रीय गूंज

कोटद्वार का ‘बाबा दुकान’ विवाद सांप्रदायिक संवेदनशीलता के कारण संसद तक पहुंचा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए।

वहीं भाजपा विधायक विनोद चमोली ने इसे कांग्रेस का नकारात्मक प्रचार बताया। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का कहना है कि राज्य की छवि लगातार धूमिल हो रही है।

चुनौती: छवि की लड़ाई या व्यवस्था की कसौटी?

इन सभी घटनाओं ने एक बात साफ कर दी है कि उत्तराखंड अब केवल पहाड़, पर्यटन और शांति की खबरों तक सीमित नहीं रहा। हर बड़ी घटना अब सीधे राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ जाती है।

विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है, सरकार इसे राजनीतिक बढ़ा-चढ़ाव कह रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि जनता को केवल आश्वासन नहीं, भरोसा चाहिए।

अगर जांच समयबद्ध, पारदर्शी और निष्पक्ष होती है तथा कानून-व्यवस्था पर सख्त नियंत्रण दिखता है, तो नकारात्मक सुर्खियां स्वतः कम होंगी। वरना सियासत का शोर देवभूमि की छवि पर भारी पड़ता रहेगा।