कौन कहता है कि कुमाऊँ का बौज्यू आलसी होता है? यह वाक्य किसी सामान्य आलोचना जैसा नहीं, बल्कि उस पर्वत पर फेंका गया पत्थर है जो सदियों से मौन खड़ा है। बौज्यू—यानी वह पिता, वह गृहस्थ, वह स्तंभ जिसके कंधों पर केवल घर नहीं, पूरी पीढ़ियों की ज़िम्मेदारी टिकी होती है। पर सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि ये आरोप अक्सर उन लोगों के मुँह से निकलते हैं, जो स्वयं संघर्ष से डरकर, संसाधनों को पहाड़ों तक लाने की हिम्मत न जुटा सके, और बहानों की गठरी बाँधकर पहाड़ छोड़कर शहरों की ओर भाग खड़े हुए।
कुमाऊँ का बौज्यू पहाड़ जैसा है—ऊपर से शांत, भीतर से ज्वालामुखी। जैसे पहाड़ अपनी ऊँचाई का ढिंढोरा नहीं पीटता, वैसे ही बौज्यू अपने संघर्ष का शोर नहीं करता। उसकी सुबह सूरज से पहले शुरू होती है और उसकी रात चिंता से पहले खत्म नहीं होती। उसके लिए भोर कोई गीत नहीं, एक कठोर प्रश्न होती है—आज घर कैसे चलेगा? बारिश उसके लिए कविता नहीं, खतरा है; बर्फ़ उसके लिए सौंदर्य नहीं, साँसों को थाम लेने वाली विवशता है।
दुर्गम पहाड़ों में बौज्यू केवल चलता नहीं, वह हर कदम पर परिस्थितियों से मुठभेड़ करता है। वहाँ सड़कें नहीं, जिद होती है। पगडंडियाँ नहीं, संकल्प होते हैं। जैसे कोई चींटी अपने से कई गुना बड़ा दाना उठाकर चट्टानों के बीच से निकल जाती है, वैसे ही बौज्यू अपने कंधों पर जीवन का बोझ उठाए चलता है। कभी पीठ पर लकड़ी, कभी घास, कभी अनाज, और कभी बीमार देह। पहाड़ में एम्बुलेंस नहीं आती। यहाँ बौज्यू ही एम्बुलेंस होता है, पसीने और साँसों से चलता हुआ।
संसाधनों की कमी यहाँ शिकायत नहीं, नियति जैसी है। पानी दूर, अस्पताल दूर, शिक्षा दूर, रोज़गार तो जैसे धुँध में खोया हुआ रास्ता। पर बौज्यू इस कमी को कोसता नहीं। वह पहाड़ की छाती पर कान लगाकर पानी की आहट सुनता है। वह पत्थरों के बीच मिट्टी खोजता है। जैसे कोई साधक कठिन तप में फल खोजता है, वैसे ही वह संसाधनों की तलाश में भटकता है—कभी जंगल, कभी बाज़ार, कभी परदेश।
और यहीं से विरोधाभास शुरू होता है। जो लोग संसाधनों को पहाड़ों तक लाने का साहस नहीं कर सके, जो संघर्ष से डरकर पलायन कर गए, वे ही लौटकर या दूर बैठकर बौज्यू पर उँगली उठाते हैं। शहरों की आरामकुर्सियों पर बैठकर, एसी कमरों की ठंडक में, वे कहते हैं। “पहाड़ का आदमी कुछ नहीं करता।” यह वैसा ही है जैसे युद्धभूमि छोड़कर भागा हुआ सिपाही, मोर्चे पर डटे सैनिक की बहादुरी पर सवाल उठाए।
शहर में बौज्यू और भी चुप हो जाता है। वहाँ उसकी बोली उसकी पहचान नहीं, बाधा बन जाती है। वह होटल में बर्तन माँजता है, फैक्ट्री में मशीन बन जाता है, चौकीदारी में रातें गिनता है। अपमान वह ऐसे पी जाता है जैसे पहाड़ बारिश को—चुपचाप। ताकि महीने के अंत में कुछ रुपये घर भेज सके। ताकि बच्चे पढ़ सकें। ताकि घर की दीवारें खड़ी रह सकें।
गाँव लौटकर वह दुकान में बैठता है। और बस यही दृश्य समाज देखता है। नहीं दिखती वे रातें जब वह छत को घूरते हुए सोचता है कि अगला साल कैसे कटेगा। नहीं दिखती वह चिंता जब फसल खराब हो जाती है। उसकी गपशप को आवारगी कहा जाता है, जबकि वह अपने जैसे थके हुए लोगों से टूटन साझा कर रहा होता है। पत्तों का खेल उसकी किस्मत से जद्दोजहद है। हुक्के का धुआँ उसकी अधूरी इच्छाओं की भाप है।
शराब हाँ, यह सच है। पर हर घूँट मस्ती नहीं, कई बार वह उस आँसू का विकल्प होता है जिसे उसने समाज के डर से कभी बहने नहीं दिया। यह समाधान नहीं, पर संकेत है—कि कहीं न कहीं यह आदमी भी टूट रहा है।
हिंसा किसी भी रूप में अस्वीकार्य है। कुछ घरों में आग है, और उसे बुझाना ज़रूरी है। पर कुछ घरों की आग से पूरे कुमाऊँ के बौज्यू को दोषी ठहरा देना वैसा ही है जैसे एक दरकते पत्थर को देखकर पूरे पर्वत को खोखला कह देना।
कुमाऊँ की ईजा नदी है—दिखती है, बहती है, जीवन देती है। कुमाऊँ का बौज्यू पहाड़ की जड़ है—दिखती नहीं, पर पूरी धरती को थामे रहती है। दोनों का संघर्ष अलग-अलग है, पर समान रूप से पवित्र।
कुमाऊँ का बौज्यू आलसी नहीं है। वह समय की आँधी में खड़ा वह वृक्ष है, जिसकी शाखाएँ टूट चुकी हैं, पर जड़ें अब भी मिट्टी से चिपकी हैं। और सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है कि उस पर आरोप वही लोग लगाते हैं, जो खुद संघर्ष से डरकर मैदानों में शरण लेने चले गए।
यदि सच जानना है, तो पहाड़ आइए। बौज्यू के साथ चलिए, उसके साथ गिरिए, उसके साथ उठिए। कुछ मौसम ही सही। तब समझ आएगा कि कुमाऊँ का बौज्यू केवल बैठता नहीं—वह पूरी उम्र पहाड़ उठाए रहता है।
✍️ हिमांशु पाठक, हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखंड)

