संत, सत्ता और संगम: आस्था के केंद्र में खड़ा सनातन का आत्ममंथन

Spread the love

सनातन परंपरा, जो सहिष्णुता, संयम और समन्वय की मिसाल मानी जाती रही है, आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहाँ आस्था के केंद्र में ही टकराव की रेखाएं उभर आई हैं। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद केवल एक व्यक्ति, एक स्नान या एक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस गहरे अंतर्विरोध को उजागर करता है, जो बीते कुछ वर्षों से धर्म, सत्ता और सार्वजनिक मंचों के बीच बनता जा रहा है।

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का बयान इस बात का संकेत देता है कि अब यह विवाद केवल धार्मिक नहीं रह गया, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन चुका है। एक ओर शंकराचार्य के चरणों में प्रणाम, दूसरी ओर उनसे आग्रह कि वे विरोध समाप्त करें—यह भाषा अपने आप में उस असहज संतुलन को दर्शाती है, जहाँ सत्ता आस्था का सम्मान भी करना चाहती है और व्यवस्था पर सवाल भी नहीं उठने देना चाहती।

दूसरी ओर, पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती का बयान इस विवाद को कहीं अधिक गंभीर धरातल पर ले जाता है। उनका यह कहना कि “यह भयंकर युद्ध को आमंत्रित करने जैसा है”, केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस चेतावनी का स्वर है, जो यह बताता है कि यदि सनातन परंपरा के शीर्ष पदों पर बैठे संतों के सम्मान और मर्यादा पर प्रश्न उठेगा, तो उसका असर साधारण श्रद्धालु तक जाएगा।

यहां प्रश्न केवल यह नहीं है कि संगम में स्नान होना चाहिए था या नहीं। असल प्रश्न यह है कि क्या आधुनिक व्यवस्थाएं सनातन की पारंपरिक संरचना और उसकी संवेदनशीलता को उसी दृष्टि से देख पा रही हैं, जिससे वह सदियों से संचालित होती आई है? क्या शंकराचार्य जैसे पद केवल धार्मिक व्यक्तित्व हैं या सनातन की वैचारिक रीढ़?

कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री की अपील इस पूरे विवाद में एक मध्यस्थ स्वर के रूप में उभरती है। उनका यह कहना कि “सनातन का मजाक नहीं बनना चाहिए” वस्तुतः उस आम सनातनी की चिंता है, जो चाहता है कि आंतरिक मतभेद सार्वजनिक तमाशा न बनें। आज जब सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर हर धार्मिक विवाद क्षणों में राष्ट्रीय बहस बन जाता है, तब यह चिंता और भी प्रासंगिक हो जाती है।

इसी क्रम में कंप्यूटर बाबा का हस्तक्षेप एक नई कड़ी जोड़ता है। बसंत पंचमी पर की गई पंच अग्नि तपस्या केवल एक आध्यात्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि एक सांकेतिक संदेश है—कि संत समाज इस विवाद को हल्के में नहीं ले रहा। 10–11 मार्च को प्रस्तावित संत सम्मेलन दरअसल इस टकराव को संवाद में बदलने की कोशिश है। गौ माता को राष्ट्र माता का दर्जा, गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध और सनातन की रक्षा जैसे मुद्दों को सामने रखकर यह संकेत दिया गया है कि यह विवाद केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि मूलभूत वैचारिक प्रश्नों का है।

बाबा रामदेव का बयान इस पूरे विमर्श को आत्मचिंतन की ओर मोड़ता है। उनका यह कहना कि “साधु वह है जिसने अहंकार मिटा दिया हो” सनातन की मूल शिक्षा की याद दिलाता है। साथ ही उनका यह संकेत कि सनातन के शत्रु बाहर बहुत हैं, अंदरूनी टकराव को और भी खतरनाक बना देता है। यह कथन केवल चेतावनी नहीं, बल्कि एक आईना है—कि कहीं हम अपने ही हाथों अपनी परंपरा की छवि को कमजोर तो नहीं कर रहे।

इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी चिंता यह है कि आस्था का विषय धीरे-धीरे शक्ति प्रदर्शन, बयानबाजी और ध्रुवीकरण का माध्यम बनता जा रहा है। शंकराचार्य परंपरा, जो संवाद, शास्त्रार्थ और विवेक का प्रतीक रही है, यदि उसी परंपरा के भीतर टकराव का कारण बनने लगे, तो यह सनातन के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

अंततः यह विवाद केवल किसी एक शंकराचार्य, किसी एक स्नान या किसी एक आयोजन का नहीं है। यह सनातन समाज के सामने खड़ा वह प्रश्न है, जहाँ उसे तय करना है कि वह संवाद, मर्यादा और संयम की अपनी परंपरा को कैसे बचाएगा। यदि समय रहते संत समाज, धार्मिक संस्थाएं और सत्ता के प्रतिनिधि मिलकर संतुलित रास्ता नहीं निकालते, तो यह विवाद आने वाले समय में और गहरी दरारें पैदा कर सकता है—जिसकी कीमत केवल किसी एक पक्ष को नहीं, पूरे सनातन समाज को चुकानी पड़ेगी।