हल्द्वानी। बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव के नतीजों ने यह भ्रम पूरी तरह तोड़ दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब भी सहानुभूति, विरासत और भावनात्मक गठबंधनों से चलाई जा सकती है। मुंबई के मतदाता ने इस बार सत्ता नहीं, राजनीति की शैली को चुना है—और यह फैसला विपक्ष के लिए चेतावनी नहीं, बल्कि करारा झटका है।
मोदी नाम बनाम ठाकरे विरासत
इस चुनाव में मुकाबला असल में भाजपा और शिवसेना या गठबंधन बनाम गठबंधन का नहीं था, बल्कि मोदी ब्रांड और ठाकरे विरासत के बीच था। नतीजों ने स्पष्ट कर दिया कि शहरी महाराष्ट्र अब विरासत से नहीं, नेतृत्व से प्रभावित होता है।
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का साथ आना राजनीतिक मजबूरी का गठजोड़ था, जिसे मतदाता ने अवसरवाद के रूप में देखा। यह गठबंधन न विचारधारा दे सका, न नेतृत्व और न ही भविष्य की कोई स्पष्ट तस्वीर।
फडणवीस का संदेश: सत्ता नहीं, नियंत्रण
देवेंद्र फडणवीस के बयान केवल राजनीतिक उत्साह नहीं, बल्कि सत्ता के मनोविज्ञान को दर्शाते हैं। जब मुख्यमंत्री यह कहते हैं कि “मेयर कौन होगा, कब होगा और कितने साल होगा—यह हम तय करेंगे”, तो यह साफ संकेत है कि भाजपा अब सहयोगी नहीं, निर्णायक शक्ति बन चुकी है।
एकनाथ शिंदे की शिवसेना के लिए यह जीत जितनी राहत है, उतनी ही चेतावनी भी, क्योंकि सत्ता का केंद्र स्पष्ट रूप से भाजपा के पास है।
मनसे और मराठी कार्ड की सियासी विदाई
राज ठाकरे की राजनीति इस चुनाव में लगभग हाशिये पर चली गई। मराठी अस्मिता, भाषा और पहचान का कार्ड मुंबई जैसे महानगर में अब सीमित प्रभाव रखता है।
मतदाता ने यह संदेश दे दिया है कि महानगरों में राजनीति भावना नहीं, सुविधा से तय होती है। पानी, सड़क, सुरक्षा और भ्रष्टाचार से मुक्ति।
विपक्ष की हार नहीं, राजनीतिक दिवालियापन
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का प्रदर्शन केवल कमजोर नहीं, बल्कि वैचारिक रूप से खोखला नजर आया। शहरी राजनीति में कांग्रेस का लगभग अप्रासंगिक हो जाना इस बात का संकेत है कि पार्टी के पास न तो नेतृत्व है और न ही कोई शहरी एजेंडा।
यूबीटी गुट का 65 सीटों पर सिमटना यह बताता है कि सहानुभूति की राजनीति की भी एक समाप्ति तिथि होती है और वह अब सामने आ चुकी है।
मुंबई की सत्ता और आने वाले चुनाव
बीएमसी की सत्ता हमेशा विधानसभा और लोकसभा चुनावों की पटकथा लिखती रही है। इस जीत ने भाजपा और महायुति को न सिर्फ प्रशासनिक नियंत्रण दिया है, बल्कि वित्तीय और संगठनात्मक बढ़त भी दी है। इसके उलट विपक्ष के पास अब न समय है, न जमीन और न स्पष्ट रणनीति।
निष्कर्ष: यह चेतावनी नहीं, फैसला है
बीएमसी चुनाव 2026 ने यह साफ कर दिया है कि महाराष्ट्र की राजनीति अब नॉस्टेल्जिया से बाहर निकल चुकी है।
मुंबई ने तय कर दिया है कि अब राजनीति भावनाओं से नहीं, परफॉर्मेंस से चलेगी और जो इस बदलाव को नहीं समझेगा, वह अगली चुनावी सूची में सिर्फ इतिहास बनकर रह जाएगा।

