“बेल के बावजूद नहीं खुला जेल का दरवाजा, खटीमा कोर्ट ने कराया न्याय”, ज्योति अधिकारी प्रकरण ने खड़े किए कई सवाल

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हल्द्वानी। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर व यूट्यूबर ज्योति अधिकारी को खटीमा न्यायालय के आदेश पर बुधवार को हल्द्वानी उप कारागार से रिहा कर दिया गया। छह दिन बाद जेल से बाहर आने पर वह मायूस नजर आईं। इस पूरे मामले को लेकर न केवल स्थानीय बल्कि राज्य स्तर के कई समाचार पत्रों में प्रमुखता से खबर प्रकाशित हुई है।

अन्य समाचार पत्रों के अनुसार, ज्योति अधिकारी को उत्तराखंड की संस्कृति, देवी-देवताओं और कुमाऊं की महिलाओं पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। वीडियो में दरांती लहराने के दृश्य को भी पुलिस ने गंभीरता से लिया। इस मामले में हल्द्वानी के मुखानी थाने में दो मुकदमे दर्ज किए गए थे।

जमानत मिली, लेकिन रिहाई नहीं हो सकी

अखबारों में प्रकाशित खबरों के मुताबिक, 13 जनवरी को हल्द्वानी कोर्ट ने दोनों मामलों में ज्योति अधिकारी को जमानत दे दी थी। बावजूद इसके, खटीमा कोतवाली में दर्ज एक अन्य मुकदमे में पुलिस ने हल्द्वानी जेल पहुंचकर वारंट बी दाखिल कर दिया। इस कारण जमानत के बाद भी ज्योति अधिकारी को एक दिन और जेल में रहना पड़ा।

खटीमा कोर्ट के आदेश पर मिली रिहाई

अन्य पत्रों में यह भी उल्लेख किया गया है कि 14 जनवरी को खटीमा न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब अभियुक्त को हल्द्वानी कोर्ट से जमानत मिल चुकी है, तो उसे जेल में निरुद्ध रखना उचित नहीं है। इसके बाद जेल प्रशासन को रिहाई के आदेश जारी किए गए।

आठ जनवरी को हुई थी गिरफ्तारी

गौरतलब है कि 8 जनवरी को मुखानी थाना पुलिस ने ज्योति अधिकारी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया था, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में हल्द्वानी उप कारागार भेज दिया गया था। बाद में उधम सिंह नगर जिले के रुद्रपुर और खटीमा कोतवाली में भी उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए।

वकीलों का पक्ष

ज्योति अधिकारी के अधिवक्ताओं जितेंद्र बिष्ट, गौरव कपूर और किरन पंत के हवाले से अन्य अखबारों में लिखा गया है कि खटीमा न्यायालय ने हल्द्वानी कोर्ट के आदेश को मान्य मानते हुए तत्काल रिहाई के निर्देश दिए।

सोशल मीडिया पर भी बहस

इस पूरे प्रकरण को लेकर सोशल मीडिया पर भी तीखी बहस देखने को मिली। कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की मर्यादा से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कई इसे कानून व्यवस्था और सांस्कृतिक सम्मान का मामला बता रहे हैं।

ज्योति अधिकारी की रिहाई के साथ ही यह मामला एक बार फिर सोशल मीडिया की जिम्मेदारी, कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक समन्वय पर बहस का विषय बन गया है। 

सोशल मीडिया, अभिव्यक्ति और कानून की सीमाएं

यूट्यूबर ज्योति अधिकारी की रिहाई का मामला केवल एक व्यक्ति की कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सोशल मीडिया की जिम्मेदारी, अभिव्यक्ति की मर्यादा और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

एक ओर, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म आज अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन चुके हैं, वहीं दूसरी ओर बिना संयम और संवेदनशीलता के की गई टिप्पणियां सामाजिक सौहार्द को ठेस पहुंचा सकती हैं। उत्तराखंड की सांस्कृतिक अस्मिता, देवी-देवताओं और महिलाओं को लेकर की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी ने जनभावनाओं को आहत किया, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दूसरी ओर, यह भी विचारणीय है कि जमानत मिलने के बावजूद प्रक्रियात्मक कारणों से किसी व्यक्ति को जेल में अतिरिक्त समय बिताना पड़े। वारंट बी जैसी प्रक्रियाएं यह दर्शाती हैं कि कानूनी तंत्र में समन्वय और समयबद्धता की अब भी आवश्यकता है।

यह मामला एक संदेश देता है कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। वहीं कानून व्यवस्था को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि न्याय केवल हो ही नहीं, बल्कि समय पर और स्पष्ट रूप से होता हुआ दिखाई भी दे।